Saturday, June 7, 2008

भारतीय समाज का निर्माण


भारतीय समाज बहुत पुराना और अत्यधिक जटिल है. प्रचलित अनुमान के अनुसार पांच हजार वर्ष पूर्व की पहली ज्ञात सभ्यता के समय से आज तक लगभग पांच हजार वर्षों की अवधि इस समाज में समाहित है. इस लंबी अवधि में विभिन्न प्रजातिय लक्षणों वाले और विविध भाषा-परिवारों के आप्रवासियों की कई लहरें यहां आकर इसकी आबादी में घुल मिल गयीं और इसे समाज की विविधता, समृद्धि और जीवंतता में अपना-अपना योगदान दिया.

समकालीन भारत में सामाजिक क्रमविकास के कई अलग-अलग स्तर साथ-साथ मौजूद हैं जैसे आदिकालीन शिकारी और भोजन संग्राहक, झूम खेती करने वाले किसान जो हल-बैल से जुताई करने के बजाय आज भी कुदाली या आद्य हल का इस्तेमाल करते हैं, विभिन्न प्रकार के घुमंतू (बकरी-भेड़ और मवेशी पालक एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूमकर व्यापार करने वाले और कारीगर तथा शिल्पी), एक ही जगह बसे किसान जो खेती के लिए हल का इस्तेमाल करते हैं, दस्तकार और प्राचीन वंश परंपरा वाले हल का इस्तेमाल करते हैं, दस्तकार और प्राचीन वंश परंपरा वाले भूस्वामी तथा अभिजात वर्ग. दुनिया के अधिकतर प्रमुख धर्म-हिंदू, इस्लाम, ईसाई और बौद्ध-यहां हैं और इनके साथ आस्था और कर्मकांड की दृष्टि से इतने अलग-अलग ढंग के संप्रदाय और पंथ भी यहां हैं जो विस्मय में डाल देते हैं. इन सबके साथ आधुनिक अकादमी अफसरशाही, औद्योगिक और वैग्यानिक अभिजन को भी जोड़ देने से हम देखते हैं कि यहां अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों साथ-साथ रह रहे हैं. अपने क्रमविकास की प्रक्रिया में भारतीय समाज ने एक मिली-जुली संस्कृति विकसित की है जिसकी जानकारी विशेषता है बहुलवाद के कुछ स्थायी संरूप (पैटर्न).

भारत के प्राचीनतम निवासियों की पहचान कर पाना कठिन है. आश्चर्य नहीं कि उनके बारे में कोई लिखित दस्तावेज नहीं है, क्योंकि उस समय लिपि का आविष्कार ही नहीं हुआ था. लोगों की मौखिक परंपरा से कोई खास मदद नहीं मिलती क्योंकि बाद में उसमें होने वाले जोड़-घटाव इस मौखिक परंपरा को इतिहास के मार्गदर्शन के रूप में भरोसेमंद नहीं रहने देते. प्रागैतिहासिक साक्ष्य अधिक भरोसेमंद हैं हालांकि इनसे पूरी कहानी नहीं जानी जा सकती. जीवन के तमाम छोटे-छोटे सूक्ष्म विवरण समय के थपेड़ों में खो जाते हैं. अब हम जानते हैं कि भारत में प्रारंभिक मानव-गतिविधियां दूसरे अंतर-हिमानी युग में 400, 000 और 200,000 ई. पू. के बीच शुरू हो चुकी थी, उस समय पत्थरों से बने उपकरण इस्तेमाल किये जाते थे.

देश के विभिन्न भागों में मिले गुफा चित्रों में उस प्रारंभिक काल के जीवन और पर्यावरण, कलात्मक अनुभूतियों और रचनात्मकता तथा संभवतः उस आदिकाल के आध्यात्मक विचारों को भी अभिव्यक्ति मिली हैं विशेषकर प्रायद्वीप भारत में मिलने वाले-महापाषाण (मेगालिथ्स) विशाल पत्थर जो अधिकतर मृतकों के स्मारक के रूप में इस्तेमाल किये गये थे-लोहे कांसे यहां तक कि सोने के भी प्रयोगों को दर्शाते हैं. नया पुरातत्व शास्त्र इन सब बातों पर तो अतिरिक्त जानकारी देने का काम शुरू कर रहा है कि लोग कैसे रहते थे, कौन-कौन सी फसले उगाते थे और क्या खाते-पीते थे, लेकिन वह यह नहीं बताता कि यहां सबसे पहले कौन आया और अन्य लोगों ने किस प्रकार क्रम में इस भूमि पर प्रवेश किया.

भारत की जनसंख्या के नृजातीत (एथनिक) तत्त्वों अर्थात प्रजातीय समूहों के संबंध में भौतिक मानवशास्त्र द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर हम अनुमान लगा सकते है कि भारत के स्वस्थानिक आदिवासी-मूल या प्राचीनतम निवासी-कौन थे. इस विषय में बी. एस. गुहा द्वारा किया गया है वर्गीकरण सर्वाधिक आधिकारिक और सबसे व्यापक रूप में मान्यता प्राप्त है. बी.ए. गुहा ने भारत की जनसंख्या में छह मुख्य प्रजातीय तत्त्वों की पहचान की हैः नेग्रीटो, प्रोटो-आस्ट्रलायड, मंगोलायड, भूमध्यसागर (मेडीटरेनियन), पश्चिमी लघुशिरस्क (वेसेटर्न ब्रैसिसिफल) तथा नोर्डिक। इसमें से प्रथम तीन इस उपमहाद्वीप के पुराने निवासी हैं. वे छोटे-छोटे क्षेत्रों के भीतर ही सीमित हैं. दक्षिण में काडर, इरुला तथा पानियान और अंडमान द्वीपसमूह में ओंग और अंडमानियों में निश्चित नेग्रीटो विशेषताएं स्पष्ट हैं. इस समूह की कुछ विशेषताएं अंगीमी नागाओं तथा राजमहलों पहाड़ियों के बागड़ियों में पायी जाती हैं. पश्चिमी पट पर कुछ समूह ऐसे हैं जिनमें नेग्रीटो लक्षण बहुत स्पष्ट हैं लेकिन वे संभवतः बाद में यहाँ आने वाले उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

--------------- श्यामाचरण दूबे, भारतीय समाज से साभार

1 comment:

Amit K. Sagar said...

बहुत अच्छा लिख रहे हो. लिखते रहो. शुभकामनायें. शुक्रिया जानकारी के लिए. ये भी बेहद जरुरी है. बहुत खूब.
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उल्टा तीर