Thursday, May 29, 2008

संस्कृति

हम कैसी अर्थव्यवस्था चाहते हैं, यह सवाल इससे जुड़ा हुआ है कि हम कैसी संस्कृति चाहते हैं. अर्थात् हम आर्थिक क्षेत्र में जो निर्णय लेते हैं, वे महज आर्थिक नहीं हैं. उनसे हमारा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य भी बनता है. प्रसिद्ध विचारक पाल बरान ने कहा है :-
एक पुरानी जर्मन कहावत है कि रसोईघर में जो पकता है, उसकी सामग्री ही बाहर से नहीं आती, रसोईघर में क्या पकेगा, यह निर्णय भी बाहर से आता है. इसी तरह खेती की नियति खेतिहर नहीं, बल्कि कृषि क्षेत्र से बाहर की शक्तियां तय करती हैं.

____________________________शब्दसंधान से साभार

1 comment:

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