Thursday, June 5, 2008

बर्बर युग



बर्बर युग आज से हजारों साल पहले का वह युग है, जब आदमी अपनी आदिम हालत में था और उसे सभ्यता की किरण भी नहीं मिली थी. तब वह पेड़ों पर, गुफाओं में, गड्ढ़ों में रहता था. नंगा ही घूमता था या अधिक-से-अधिक पत्तों, पेड़ों की छाल या मारे हुए जानवरों की खाल से अपना तन ढकता था. न तो उसके पास रहने को गाँव थे, न मकान, न खाने को उगाया हुआ अन्न था, न पहनने को वस्त्र। जीने के साधन उसके पास सीमित थे. उन साधनों में सबसे महत्त्वपूर्ण शिकार था. शिकार करके ही वह अपना पेट पालता था.
पर यह शिकार बहुत आसान नहीं था. छोटे-बड़े खूँखार जानवरों का शिकार और वह भी मामूली हथियारों से। तब हाथी से कई गुना बड़े जानवर थे, जो आज खत्म हो गए हैं. ऐसे ही तलवार के से दाढ़ों वाले शेर थे, जिनकी शक्ल आज बिलकुल बदल गई है. तब धातु का ज्ञान नहीं हुआ था. अतः हथियार पत्थर के ही थे, तेज पत्थर के, जिन्हें रगड़कर और फिर लड़की में ठोंककर भाले का फल बना लिया जाता था.
शिकार करना इतना कठिन था कि आदमी अपनी सफलता के लिए अपनी ताकत के ऊपर ही निर्भर नहीं करता था. वह उसके लिए कई प्रकार के जादू-टोने भी करता था. इस प्रकार का एक टोटका था अपनी पहाड़ी की खोह की दीवार पर शिकार किए जाने वाले जानवरों का रेखाचित्र बनाकर, उसे तीरों और भालों से बेध देना. यह शिकारियों को शिकार के शरीर को, उसके अंग-प्रत्यंग को पूरी तरह समझने का मौका देता ही था, साथ ही शिकारियों के विश्वास के अनुसार उन्हें मारने का टोटका भी तैयार कर देता था. अपने भालों से मारने के पहले शिकारी शिकार को चित्र में मार डालते थे. इन रेखाचित्रों को जब-तब फुरसत में वे रंगों से भी सँवारते थे.
इस प्रकार के अनेक चित्र आज से पच्चीस-पच्चीस हजार साल पुराने, उनसे भी पुराने और नए, स्पेन, फ्रांस और अपने देश की खोहों-कन्दराओं में बने मिले हैं. स्पेन देश की अल्टामाइरा और दक्खिनी फ्रांस में सांड़-भैंसों के शिकार के अनुपम चित्र मिलते हैं. ऐसे ही अपने देश में भी मध्य प्रदेश की कुछ कन्दराओं में और मिर्जापुर की गुफाओं में उस प्रचीन काल के जंगली शिकारियों के चित्र हैं, जो हमारे देश की चित्रकला के सबसे पुराने नमूने हैं.
इसके बाद चित्रकारी के नमूने हमें अपने देश में आज से करीब पाँच हजार साल पहले के मिलते हैं. ये सिन्धु घाटी सी सभ्यता के हैं, जो मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और नाल में मिले हैं। ये तीनों इस समय पाकिस्तान में हैं. मोहनजोदड़ो सिन्ध में, हड़प्पा मिंटगुमरी जिले में तथा नाल बलूचिस्तान में है. इसके नमूने कागज पर नहीं है; क्योंकि आदमी ने अभी कागज का इस्तेमाल नहीं सीखा था. फिर भी खूबसूरती का प्रेमी होने के कारण वह अपने बर्तनों, मटकों को चटक रंगों से रँगता और उन पर कई रंगों से साँपों, चटाई और बुनाई और दूसरे प्रकार की शक्लें या जानवरों की तश्वीरें बनाता था. तब के अनेक नमूने हमारे और पाकिस्तान के अजायबघरों में रखे हुए हैं.
बाद के चित्र पत्थर, लकड़ी, हड्डी, हाथी दाँत, चमड़ा, कपड़ा ,भोजपत्र, ताड़पत्र, कागज आदि पर बने। अगले युगों के चित्रों के वर्णन इन्हीं पर बनी तस्वीरों से सम्बन्ध रखते हैं.

--------------------------------- भगवतशरण उपाध्याय

1 comment:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

ब्लॉगजगत में आपका स्वागत है

आपकी लेखनी सशक्त है. शुभकामनायें