Saturday, January 17, 2009
sixth pay for university teachers
it is known to us that in the sixth pay,basic pay is fixed based on the pay grade.The rules says that if the pay grade is 5400 the basic pay is 15600,if the pay grade is 6600 the basic pay is fixed at 18750,and if pay grade is 7600 then basic pay is fixed at 21900,if pay grade is 8700 then basic is fixed at 37300 and so on.Now the acadamic pay grades are 6000,7000,8000,9000,which is clearly not in the rules of the sixth pay commission rules as notified by the govt of India.As per the definition of pay grade in the sixth pay commission,if the pay grade is 6000 the basic pay should be fixed at Rs 17175.For the pay grade 7000, the basic pay should be at Rs 19970,and for pay grade 8000 the basic pay should be fixed at rs 27190.Now the total bsic pays at the pay grades of 6000,7000,8000 should be 23175,26970,35190 respectively.the main argument is if our pay grade is 6000,how can our basic pay will be fixed at 15600 rather it should be at 17175 and so on.since our pay grade is not defined in the definition of sixth pay of the govt of india.So some mathematical modeling should be applied.Let x denotes the pay grade and y denotes the basic pay to be fixed.by using the well known pay grades x=5400,6600,7600,8700 etc and basic pays y=15600,18750,21900,37300 etc.Using the principle of the least square,we can fit an appropriate curve in the x-y plane.one of the simpliest method is fixing them linearly piece wise.i.e. join pts (5400,15600) and (6600,18750);join pts (6600,18750) and (7600,21900) lastly join pts (7600,21900) and (8700,37300).From this graph if x=6000,7000,8000 then y=17175,19970,27190 respectively.Thus the total basic pays should be 23175,26970,35190 for the pay grades of 6000,7000,8000 respectively.We should keep in mind that in the sixth pay commission pay grades determine the position of the post.
Wednesday, August 13, 2008
होरी और उन्नीस सौ चौरासी (व्यंग्य)
1984 का दिसंबर। 1934-35 के दिन होते तो प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ का नायक होरी इस वक्त अपने गाँव सेमरी में टूटे छप्पर के नीचे बैठा हुआ इधर-उधर से बीनकर लाई हुई लकड़ी और ईख की सूखी पत्तियों का अलाव ताप रहा होता। पर 1984-खासतौर से जार्ज आर्वेल के 1984-में होरी कुछ और ही हो गया है। वह अब हुक्का नहीं, बीड़ी पी रहा है। कछार में चोरी से चुआया हुआ महुए का ठर्रा भी वाजिब खुराक में पी चुका है। वह पंडित मातादीन की पक्की चौपाल में, पूस की रात के इस पहले पहर में टी.वी. देख रहा है और ‘प्रोलफीड’ खा रहा है।
‘पंडित’ मातादीन ? ‘गोदान’ के पाठक शायद चौंके। यह वही मातादीन है न जिसके पिता पंडित दातादीन थे, जिसने सिलिया नाम की चमारिन से प्यार किया था, जिसके प्यार का फल रामू था, जिसने बाद में सिलिया को अपनाते हुए कहा था, ‘‘मैं ब्राह्मण नहीं चमार ही रहना चाहता हूँ !’’ वह फिर से पंडित कैसे ? इसकी चर्चा बाद में होगी, पहले होरी और उसका ‘प्रोलफीड’।
‘प्रोलफीड’-बकौल जार्ज आर्वेल-प्रोलेतेरियत की खुराक, पार्टी की ओर से जनता को बराबर मिलनेवाला कूडा, मनोरंजन और फर्जी खबरों का मसाला। दूरदर्शन ‘प्रोलफीड’ उगल रहा है:
पिछले पाँच वर्षों में भारत की औसत सालाना विकास-दर 4.9% रही है, जबकि अमरीका की 1.2% और इंग्लैड की सिर्फ 0.3% । 1979-80 में कोयले का उत्पादन 10 करोड़ 40 लाख टन था। आज 1983-84 में यह बढ़कर 13 करोड़ 80 लाख टन हो गया है। पेट्रोल का उत्पादन उसी दौरान 1 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 2 करोड़ 60 लाख टन हो गया।...
होरी सुन रहा है, पर उसके लिए यह ऐसा संगीत है जिसके स्वरों का उतार-चढ़ाव तो समझ में आता है, शब्द पकड़ में नहीं आते। उसे कोयला और पेट्रोल से क्या लेना-देना ?
...जहाँ 1950-51 में सिर्फ 5 करोड़ टन अनाज पैदा हुआ था, अब 1984 में 15 करोड़ टन पैदा हुआ है..।
हुआ होगा, कहीं गोदामों में सड़ रहा होगा, चूहे खा रहे होंगे। उसे तो यह अनाज ‘काम के बदले अनाज’ के एवज में दाना-दाना गिनकर ही मिल रहा है, चार दिन भी बुखार आ जाए तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
....राष्ट्रीयकृत बैकों की 24000 शाखाओं के जरिए 1983-84 में देहाती क्षेत्रों में 4500 करोड़ रुपये की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई...।
जिसमें से दो-तिहाई ग्रामसेवकों, विकास-अधिकारियों, शाखा-प्रबंधकों की जेब में गई, जिससे उन्होंने ट्रक खरीदे और शहरों में कोठियाँ बनवाई, बाकी ऋण होरी जैसे अभागों को ऋणी बनाने के काम आया।
प्रोलफीड के शुरुआती आकड़े होरी के खयालों की बहती धारा में पतझर के पत्तों जैसे टपककर बह रहे थे। पर ऋण के ये आँकड़े उसकी चेतना पर दहकते हुए कोयलों-जैसे गिरे।
होरी के समुदाय ने रुपए और सूदखोरी की मार पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेली है। ‘गोदान’ के दिनोंवाली वह साहूकारी। पंडित दातादीन, दुलारी सहुआइन झिंगुरींसिंह, पटेश्वरी मंगरू साह। पचास रुपए के कर्ज पर मंगरू साह ने तीन सौ रुपए निकाले थे, ईख नीलाम करवाई थी। मीठी जबान के बावजूद दुलारी सहुआइन नाक रगड़ाकर ही दो सौ रुपए देने को तैयार हुई थीं, आने पर ब्याज लेनेवाले पंडित दातादीन ने नौ साल में तीस रुपए पर दो सौ माँगे थे। उन्हीं की कृपा थी कि होरी की खेती-बारी टूट गई, ईख नहीं बो सका और किसान से मजदूर की श्रेणी में आ गया। तब एक-एक रुपए के पीछे जैसी घुटन, जैसा अपमान झेलना पड़ता था, उसकी याद आते ही आज भी दिल को एक झटका लगता है।
और, आज बकौल ‘प्रोलफीड’ 1983-84 में राष्ट्रीयकृत बैकों से 4500 करोड़ रुपए की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई। होरी सार्वजनिक और स्वगत ढंग से कहता है: मार डाला बेईमानों ने।
1935 के होरी को साहूकारी सभ्यता के पेंच समझ में नहीं आए थे, सिर्फ इतना मालूम था-‘हम जाल में फँसे हैं। जितना ही फड़फड़ाओगे, उतना ही और जकड़ते जाओगे।’ एक तो सबकुछ भाग्य के अधीन था, दूसरे साहूकार भी तरह-तरह के थे। ‘‘ठाकुर या बनिए के रुपए होते तो ज्यादा चिंता न होती, पर ब्राह्मण के रुपए ! उसकी एक पाई भी दब गई तो हड्डी तोड़कर निकलेगी ! भगवान् न करे ब्राह्मण का कोप किसी पर गिरे !’’ तभी, जब गोबर ने दातादीन की सूदखोरी को चुनौती देकर तीस रुपए के कर्ज पर दो सौ की माँग के खिलाफ ब्याज समेत छाछठ रुपए लौटाने चाहे तो होरी ने साहूकार पंडित के चरण पकड़ लिए थे, कहा था, ‘‘महाराज, लड़कों की बातों पर मत जाओ। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हारी एक-एक पाई चुकाऊँगा।’’ उस साहूकारी तंत्र में बड़े रहस्य थे: सूद का कभी न समझ में आनेवाला हिसाब, बामन के कर्ज का डर, थाना-कचहरी की दौड़, खड़ी फसल की नीलामी, वसूली के तरीकों में गालियों और डंडे का प्रयोग, और सबसे बड़ी बात कि जितना ही फ़ड़फड़ाओगे उतना ही जकड़ते जाओगे।
1984 में बहुत कुछ बदला है पर सूदखोरी नहीं बदली। होरी के सिर पर अब दो तरह के कर्जें है। एक खेतिहर ऋण जो सिंचाई के साधन से लेकर खेती के औजारों, मशीनों, खाद, बीज आदि तक के लिए मिलता है, और दूसरा असली ऋण-बिरादरी में बेइज्जती से बचने के लिए लिया जानेवाला ऋण। पहले ऋण को सरकारी अर्थशास्त्री विकासपरक ऋण कहते हैं, दूसरे को सामाजिक दायित्वों वाला ऋण। चूँकि होरी को अर्थशास्त्र की नहीं, पुराणपंथियों की ही भाषा समझ में आती है, इसलिए पहले को देवऋण कहा जा सकता है, जो देवताओं की योनि में उपजे वित्त मंत्रालय के अधिकारियों, बड़े-बड़े बैंकरों, अर्थशास्त्रियों, ऋण-वितरण-सामारोहों की अध्यक्षता करनेवाले खादीपोश बहुरूपियों और चपरकनाती अफसरों की कृपा से प्राप्त होता है। दूसरा ऋण, उसी पुराणपंथी भाषा में पितृ-ऋण है जो पिता की कृपा से किसी जाति-विशेष में उत्पन्न होने के कारण मुंडन, छेदन, ब्याह, गौना, दसवाँ, तेरहीं आदि रस्मों को निपटाने के लिए फिर उन्हीं दुलारी सहुआइनों, उन्हीं दातादीनों, उन्हीं मंगरू साहुओं से लेना पड़ता है जो अब पहले से भी ज्यादा चतुर हैं, जिनके लड़के अब आई. ए. एस. में घुसकर या बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री लेकर उसी तबके में घुस रहे हैं जो देव-ऋण बाँटनेवालों का है। ‘उन्नीस सौ चौरासी’ का लेखक जार्ज आर्वेल इसे अपनी ‘न्यूस्पोक’ में ‘देपिसह’ कह सकता था-देव-पितृ-सहायता। ऋण अब रहा ही नहीं, जो भी ऋण देता है वह वास्तव में सहायता दे रहा है। और चूँकि देव-ऋण और पितृ-ऋण देनेवाले-दोनों ही किस्म के लोग एक ही वर्ग और एक ही पार्टी के हैं, इसलिए होरी को इन ऋणों से अलग-अलग तंत्र में भले ही फर्क मालूम पड़े, ऋण देनेवाले जानते हैं कि वे एक ही बिरादरी के हैं। इस तरह, दो कामों के लिए दो तरह का ऋण दो अलग-अलग रास्तों से आने के बावजूद चाहे सहकारी या सरकारी बैंक हो या पुश्तैनी सूदखोर, वसूली के मामले में दोनों एक-से घातक हैं, दोनों ही खेत कुर्क करा सकते हैं, दोनों ही हवालात भिजवा सकते हैं। यह सूदखोरी व्यवस्था का द्वित्व (डाइकॉटमी) नहीं है, सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के दुर्दांत सूदखोरों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है। संक्षेप में 1935 में होरी को जहाँ नदी के इस किनारे पर पड़े मगरमच्छ निगलने को झपटते थे, वहीं अब उसे दोनों किनारों पर अलग-अलग शक्लवाले, पर एक ही नस्ल के मगरमच्छों का सामना करना पड़ता है। होरी की यह अजीब नियति है कि वह इस नदी को छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता।
प्रोलफीड में 4500 करोड़ रुपए के खेतिहर ऋण का हवाला होरी के गले में हड्डी की तरह अटक जाता है। इस खेतिहर ऋण ने उसके साथ जो किया है, वैसा पंडित दातादीन और सेमरी के सारे साहूकार मिलकर भी नहीं कर सकते थे। उनके सामने कम से कम घिघियाया जा सकता था, कोई दुलारी सहुआइन कुछ देर के लिए द्रवित भी हो सकती थी, पर इसके सामने कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कानूनबद्ध चेहरारहित साहूकार कभी उसके सामने आता ही नहीं है, उसके अस्तित्व का पता कुछ सरकारी कारकुनों और अखबार में छपनेवाली कुर्की के इश्तहारों से ही चलता है।
इस साहूकारी व्यवस्था के शिखर पर बैठे हुए जो परम उत्साही व्यवसाय-विशेषज्ञ शहरी बाबू हैं, जो इस देश की राजनीतिक संध्या के निर्जन सुनसान में अचानक भारत-भाग्य-विधाता बन गए हैं, वोट पकड़ने के तंत्र में कर्ज की राजनीति को खूब समझते हैं। पर वे यह नहीं समझते कि गरीबी सबसे पहले इन्सान की पहल करने की शक्ति को नष्ट करती है। सर्वहारा का मकरुज होना, वह अच्छी नस्ल की भैंस के कारण हो या बिरादरी के भोज के लिए, कोढ़ में सिर्फ खाज का काम करता है।
झिंगुरीसिंह के लिए अपनी उम्दा जोत के लिए, जो चकबंदी के कारकुनों के कारण और भी उम्दा हो गई है, ट्यूबवेल के लिए कर्ज लेना दीगर बात है। वह समृद्ध को समृद्धतर बनाता है। वह कर्ज वापस न कर सकें, तब भी अपनी समृद्धि और राजनीतिक पुर्जेबाजी के सहारे वह अपनी जोत बचा ले जाएगा। पर ठर्रे में गनगनाते दिमाग के साथ प्रोलफीड खाते हुए इस होरी के साथ 1984 में क्या हुआ।
कुछ साल पहले उसे, जैसे सुअर के बच्चे को चार आदमी दबाकर उसका गला रेतते हैं, एक नसबंदी शिविर में जाकर नसबंदी करानी पड़ी थी। उसकी एक नस काट दी गई, पर उसे ज्यादा दुख नहीं हुआ था। जबसे वह पैदा हुआ, एक-एक करके उसकी नसें ही काटी जा रही थीं। उसने इससे भी समझौता कर लिया। पर कुछ ही साल बाद नसबंदी-शिविरों की जगह खेतिहर-ऋण के शिविरों ने ले ली। अब विकास-खंड के कर्मचारी और तहसील का पूरा अमला गाँव पर गिद्धों की तरह उतर रहा था। सेमरी के पास के गाँव बिलारी में, जहाँ पहले वहाँ के जमींदार रायसाहब ‘गोदान’ के 1934 में रामलीला का जलसा कराते थे, उनके लड़के ने, जो विधायक भी थे और जिन्हें विधायक से मंत्री बनना था, साल भर पहले ऋण-वितरण शिविर लगवाया था, जिसका लक्ष्य खेतिहरों में बीस लाख रुपए का ऋण बाँटना था। दिल्ली का खादीपोश युवा नेता जो देश की अखंडता और एकता की लगातार बातें करता था और जिसकी बातें होरी की पहुँच से बाहर थी, पूरे चेहरे को मुस्कान का अगियाबेताल बनाकर लोगों को ऋण बांट रहा था। बैंक के हाकिम बरसाती मेंढ़कों की तरह उसके आसपास फुदक रहे ते। उसी जलसे में होरी पर भी कुछ हजार रुपयों का कर्ज लाद दिया गया था।
उसे भैंस की जरूरत नहीं थी। 1935 के होरी ने एक गाय खरीदी थी; उधार पर, वह किस्सा अभी तक लोगों को याद है। सबकुछ ठीक था पर उसके भाई ने डाह के मारे गाय को जहर दे दिया था। उसी झमेले में गाय का पुराना मालिक भोला उसके बैल खोल ले गया था। अब, 1984 में, होरी में कर्ज लेकर भैंस खरीदने की दम न थी। पर तहसीलवाले नहीं माने। कोई लंबा-चौड़ा हिसाब दिखाकर उन्होंने बताया कि भैंस के दूध से, बैंक का कर्ज चुकाते हुए भी, होरी को कई सौ रुपए महीने का मुनाफा होगा। पर यह होरी भाग्य के बारे में अब और भी चौकन्ना हो गया था। वह जानता था कि ऐसी खूबसूरत स्कीम को भीतर-ही-भीतर खाने के लिए कोई न कोई कीड़ा जरूर लगा होगा। वह कीड़ा ग्रामसेवक था जिसने कर्ज का एक हिस्सा कमीशन में कटवा लिया था, दूसरा पशु-चिकित्सक था जिसने एक बड़े मेले में अच्छी नस्ल की भैंसों की सामूहिक खरीद कराके उसे तीन थन वाली एक भैंस का पगहा पकड़ा दिया था।
भैंस बीमार हालत में आज भी होरी के दरवाजे पर है। 1935 में उसकी गाय को उसके भाई ने जहर दिया था। आज, 1984 में उसकी जिंदगी में इन ऋण-वितरण शिविरवालों ने इस भैंस के बहाने न जाने कितना जहर घोल दिया है, वसूली के लिए कुर्की आने ही वाली है।
यह देव-ऋण का हाल है। पितृ-ऋण के लिए यानी, सोना की शादी के लिए उसे रुपयों की जरूरत है; अब दहेज ठीक से न दिया जाए तो लड़की पर मिट्टी का तेल छिड़ककर उसे जला देते हैं। होरी को दहेज के लिए कर्ज चाहिए। पर इस काम के लिए राष्ट्रीयकृत बैंक, सहकारी बैंक, ग्रामीण बैंक-सब बेकार हैं। उधर आज गाँव में दु्लारी सहुआइन और मंगरू साह भी नहीं है। डकैतों के डर से वे शहर के एक घने मुहल्ले में-जो साहूकारों की पुश्तैनी बस्ती है-जा बसे हैं। इन साहूकारों के भव्य भवन बने हैं, वे टेलीफोन पर कारोबार करते हैं। खेतिहर-ऋण-वितरण-शिविरवाला खादीपोश नेता इनके यहाँ दावत खाने आता है। होरी की लड़की की शादी के लिए बैंक ऋण नहीं देगा, यह ऋण उसे इन्हीं सूदखोरों से मिलेगा और इनकी शर्तें मंगरू साह की शर्तों से भी ज्यादा भयावह है।
पंडित मातादीन को यह टी.वी. सेट, बहुत किफायती लागत पर, पार्टी के प्रचार के लिए मिला है। होरी और वैसे ही दस-पाँच होरियों को ‘प्रोलफीड’ के साथ छोड़कर वे मकान के अंदर चले गए हैं-उसी काम के लिए चोरी से चुराया हुआ महुए का ठर्रा पीने को। बाहर आकर यह देखकर कि टी.वी. पर कोई ऐसी गजल आ रही है, जिसमें गले लग जाने और बोसा लेने की इफारत है, वे सेट बंद कर देते हैं,। फिर लोगों को धर्मचारी जी का उपदेश, उनकी तांत्रिक सिद्धियों की महत्ता और उनके रचे भजनों का पाठ सुनाने लगते हैं।
पर वे तो चमार हो गए थे, फिर से पंडित कैसे हो गए ? ऐसे। सिलिया और उनका बेटा रामू पढ़ने में अच्छा निकला। उसने अपनी माँ की जाति को अपनी जाति बनाकर सुरक्षित जगहों में से आबकारी के इंस्पेक्टर की एक जगह ले ली। लड़के के इंस्पेक्टर बनते ही गाँववालों ने तय किया कि अब मातादीन को चमार नहीं कहा जा सकता, इसलिए उन्हें पंडितजी कहा जाने लगा। उनकी चुटिया अचानक बढ़ी ही नहीं, उठ भी गई, उनके शरीर पर तीन धागे फिर से वापस आ गए। जिस एक गाँव ने बेटे को चमार बनाकर इंस्पेक्टर बनाया, उसी ने बाप को फिर से ब्राह्मण बना दिया। अब मातादीन के यहाँ सरकारी अमलों की आमद-रफ्त बढ़ रही है। पार्टी की स्थानीय शाखा के वे अध्यक्ष नामजद हुए हैं।
ऐल्डास हक्सले के ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में यौनाचार एक अच्छा और अनिवार्य कर्त्तव्य है, जार्ज आर्वेल के ‘उन्नीस सौ चौरासी’ में यौनाचार एक घटिया, गर्हित काम है। आज होरी के 1984 में सिर्फ बलात्कार से प्राप्त यौन-संतोष ही चरम संतोष है। ‘गोदान’ के 1935 में सोना, रूपा, सिलिया, झुनिया गाँव में मुक्त पक्षियों की तरह रहती थीं। खुद जिनके लिए उनके मन में आकर्षण हो, उन्हें छोड़कर बाकी सबसे भाईचारे के संबंध थे। शहर में पढ़नेवाले झिंगुरीसिंह के लड़कों ने ही उन दिनों भविष्य का इशारा दिया था, जब उनके बारे में कहा गया था कि शहर में पढ़ने जाकर उन्होंने गाँव की बिरादरी का नेम-धरम भुला दिया है।
अब होरी को सिर्फ सरकारी कर्ज की ही चिंता नहीं है, घर में जवान लड़कियों का बोझ उसे दिन-रात कुचलता रहता है। वह जमाना नहीं रहा जब गाँव के किसी लड़के की बदचलनी पर पंचायत बैठती थी, हर्जाना भरना पड़ता था। अब वह लड़का पंचायत को गाली देकर शहर भाग सकता है, वहाँ रिक्शा चलाकर किसी भी खेतिहर मजदूर से ज्यादा कमा सकता है।
चारों ओर असुरक्षा है। शाम से ही घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सूरज डूबते ही सन्नाटा छा जाता है। कभी-कभी कुत्ते भौंकते हैं, जिससे अँधेरे का आतंक और गहराने लगता है। चारों ओर के जंगल और बाग-सरकारी वनमहोत्सवों के ढकोसलों के बावजूद कट गए हैं। अब गीदड़ और चमगादड़ तक नहीं बोलते। ‘पूस की रात’ जैसी कहानी में जाड़ा ही अब सबसे बड़ा यथार्थ बचा है। हिरनों और नीलगायों के झुंड अब फसल चरने नहीं आते। उनकी जगह गिरोहबंद डकैतों ने ले ली है। वे किसी भी गाँव से निकल सकते है। वे सिर्फ लूटपाट करने नहीं आते, जवान बेटियों और बहुओं के लिए भी आते हैं। वे उनकी काम-क्षुधा का सबसे बड़ा आहार हैं। बूढ़ें संपाती की तरह होरी उन्हें बचाने में असमर्थ है।
मातादीन समझाते हैं: लड़कियों को कुछ दिन के लिए शहर में गोबर के पास छोड़ आओ। शादी तय हो जाए, तब बुला लेना।
बड़ी-बड़ी तरक्कियाँ हुई हैं। पक्के मकान, बिजली, सड़के, स्कूल..पर होरी, उसके जैसे लाखों खेतिहर मजदूर और करोड़ों आदिवासी- इन सबके लिए 1984 आज भी जार्ज आर्वेल का दु:स्वप्न जैसा ही है। आजादी के बाद के आर्थिक उभार और राजनीति का फायदा बहुतों को मिला होगा, पर होरी जैसे खेतिहर मजदूर के लिए न कोई मिनिमम वेजेज़ ऐक्ट लागू होनेवाला है, न वर्कमेंस कंपेसेशन ऐक्ट। न बीमारी में उसकी व्यथा सुननेवाला कोई डाक्टर है न तमंचे की चोट से बचानेवाला कोई थानेदार। उसके बारे में सत्तापतियों की सिर्फ तीन चिंताएँ हैं: उसे बच्चा पैदा करने से कैसे रोका जाए भूदान में मिले एक बीघा ऊसर के लिए उसको ज्यादा-से-ज्यादा विकास-ऋण कैसे पकड़ा दिया जाए और भले ही डकैतों की गोली लगने पर उसे थाने पर रपट लिखाने के लिए चौदह किलोमीटर चलना पड़े, उसका वोट लेने के लिए पोलिंग स्टेशन उसके दरवाजे पर कैसे खड़ा कर दिया जाए। आतंक, असुरक्षा, कर्ज और दरिद्रता से जूझते हुए होरी को अब राहत के नाम पर महुए का अवैध ठर्रा-भर बचा है, जो जार्ज आर्वेल के 1984 में विस्टन स्मिथ को भी विक्टरी जिन के नाम से मिला था, और मिला है पंडित मातादीन के घर का टी.वी. सेट, जो विंस्टन स्मिथ के खुद अपने घर में लगा था। ऐल्डोस हक्सले ने शायद इसी की कल्पना करके आर्वेल को अपने एक पत्र में लिखा था:
‘‘अगली पीढ़ी आते-आते, मुझे लगता है, दुनिया के शासकगण यह जान जाएँगे कि लोगों पर शासन करने के लिए उनमें बालबुद्धि और मृदुता का उद्दीपन क्लबों और जेलों से ज्यादा कारगर साबित हो सकता है और ठोकर और कोड़े मारकर लोगों को काबू में लाने के बजाय प्रेमपूर्वक उनको अपनी दास-भावना में आसक्त बनाकर शक्ति की प्रबल आकांक्षा को मजे से संतुष्ट किया जा सकता है।’’
प्रोलफीड में सबकुछ गलत नहीं है। बेशक, फिल्म एक्टर, संगीतकार, प्रबंध-विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, अंतरिक्षयात्री, उद्योगपति, दार्शनिक, न्यायविद् हमारी जिंदगी को समृद्धतर बनाने में लगे हैं, पर होरी की बदकिस्मती कहिए, उस जिंदगी पर हुकूमत छुरेबाजों, दलालों, सूदखोरों बौद्धिक नपुंसकों, डकैतों, संवेदनहीन हाकिमों और राजनीतिक मौकापरस्तों की है।
________श्रीलाल शुक्ल, कुछ जमीन पर कुछ हवा में से अंश साभार
‘पंडित’ मातादीन ? ‘गोदान’ के पाठक शायद चौंके। यह वही मातादीन है न जिसके पिता पंडित दातादीन थे, जिसने सिलिया नाम की चमारिन से प्यार किया था, जिसके प्यार का फल रामू था, जिसने बाद में सिलिया को अपनाते हुए कहा था, ‘‘मैं ब्राह्मण नहीं चमार ही रहना चाहता हूँ !’’ वह फिर से पंडित कैसे ? इसकी चर्चा बाद में होगी, पहले होरी और उसका ‘प्रोलफीड’।
‘प्रोलफीड’-बकौल जार्ज आर्वेल-प्रोलेतेरियत की खुराक, पार्टी की ओर से जनता को बराबर मिलनेवाला कूडा, मनोरंजन और फर्जी खबरों का मसाला। दूरदर्शन ‘प्रोलफीड’ उगल रहा है:
पिछले पाँच वर्षों में भारत की औसत सालाना विकास-दर 4.9% रही है, जबकि अमरीका की 1.2% और इंग्लैड की सिर्फ 0.3% । 1979-80 में कोयले का उत्पादन 10 करोड़ 40 लाख टन था। आज 1983-84 में यह बढ़कर 13 करोड़ 80 लाख टन हो गया है। पेट्रोल का उत्पादन उसी दौरान 1 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 2 करोड़ 60 लाख टन हो गया।...
होरी सुन रहा है, पर उसके लिए यह ऐसा संगीत है जिसके स्वरों का उतार-चढ़ाव तो समझ में आता है, शब्द पकड़ में नहीं आते। उसे कोयला और पेट्रोल से क्या लेना-देना ?
...जहाँ 1950-51 में सिर्फ 5 करोड़ टन अनाज पैदा हुआ था, अब 1984 में 15 करोड़ टन पैदा हुआ है..।
हुआ होगा, कहीं गोदामों में सड़ रहा होगा, चूहे खा रहे होंगे। उसे तो यह अनाज ‘काम के बदले अनाज’ के एवज में दाना-दाना गिनकर ही मिल रहा है, चार दिन भी बुखार आ जाए तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
....राष्ट्रीयकृत बैकों की 24000 शाखाओं के जरिए 1983-84 में देहाती क्षेत्रों में 4500 करोड़ रुपये की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई...।
जिसमें से दो-तिहाई ग्रामसेवकों, विकास-अधिकारियों, शाखा-प्रबंधकों की जेब में गई, जिससे उन्होंने ट्रक खरीदे और शहरों में कोठियाँ बनवाई, बाकी ऋण होरी जैसे अभागों को ऋणी बनाने के काम आया।
प्रोलफीड के शुरुआती आकड़े होरी के खयालों की बहती धारा में पतझर के पत्तों जैसे टपककर बह रहे थे। पर ऋण के ये आँकड़े उसकी चेतना पर दहकते हुए कोयलों-जैसे गिरे।
होरी के समुदाय ने रुपए और सूदखोरी की मार पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेली है। ‘गोदान’ के दिनोंवाली वह साहूकारी। पंडित दातादीन, दुलारी सहुआइन झिंगुरींसिंह, पटेश्वरी मंगरू साह। पचास रुपए के कर्ज पर मंगरू साह ने तीन सौ रुपए निकाले थे, ईख नीलाम करवाई थी। मीठी जबान के बावजूद दुलारी सहुआइन नाक रगड़ाकर ही दो सौ रुपए देने को तैयार हुई थीं, आने पर ब्याज लेनेवाले पंडित दातादीन ने नौ साल में तीस रुपए पर दो सौ माँगे थे। उन्हीं की कृपा थी कि होरी की खेती-बारी टूट गई, ईख नहीं बो सका और किसान से मजदूर की श्रेणी में आ गया। तब एक-एक रुपए के पीछे जैसी घुटन, जैसा अपमान झेलना पड़ता था, उसकी याद आते ही आज भी दिल को एक झटका लगता है।
और, आज बकौल ‘प्रोलफीड’ 1983-84 में राष्ट्रीयकृत बैकों से 4500 करोड़ रुपए की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई। होरी सार्वजनिक और स्वगत ढंग से कहता है: मार डाला बेईमानों ने।
1935 के होरी को साहूकारी सभ्यता के पेंच समझ में नहीं आए थे, सिर्फ इतना मालूम था-‘हम जाल में फँसे हैं। जितना ही फड़फड़ाओगे, उतना ही और जकड़ते जाओगे।’ एक तो सबकुछ भाग्य के अधीन था, दूसरे साहूकार भी तरह-तरह के थे। ‘‘ठाकुर या बनिए के रुपए होते तो ज्यादा चिंता न होती, पर ब्राह्मण के रुपए ! उसकी एक पाई भी दब गई तो हड्डी तोड़कर निकलेगी ! भगवान् न करे ब्राह्मण का कोप किसी पर गिरे !’’ तभी, जब गोबर ने दातादीन की सूदखोरी को चुनौती देकर तीस रुपए के कर्ज पर दो सौ की माँग के खिलाफ ब्याज समेत छाछठ रुपए लौटाने चाहे तो होरी ने साहूकार पंडित के चरण पकड़ लिए थे, कहा था, ‘‘महाराज, लड़कों की बातों पर मत जाओ। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हारी एक-एक पाई चुकाऊँगा।’’ उस साहूकारी तंत्र में बड़े रहस्य थे: सूद का कभी न समझ में आनेवाला हिसाब, बामन के कर्ज का डर, थाना-कचहरी की दौड़, खड़ी फसल की नीलामी, वसूली के तरीकों में गालियों और डंडे का प्रयोग, और सबसे बड़ी बात कि जितना ही फ़ड़फड़ाओगे उतना ही जकड़ते जाओगे।
1984 में बहुत कुछ बदला है पर सूदखोरी नहीं बदली। होरी के सिर पर अब दो तरह के कर्जें है। एक खेतिहर ऋण जो सिंचाई के साधन से लेकर खेती के औजारों, मशीनों, खाद, बीज आदि तक के लिए मिलता है, और दूसरा असली ऋण-बिरादरी में बेइज्जती से बचने के लिए लिया जानेवाला ऋण। पहले ऋण को सरकारी अर्थशास्त्री विकासपरक ऋण कहते हैं, दूसरे को सामाजिक दायित्वों वाला ऋण। चूँकि होरी को अर्थशास्त्र की नहीं, पुराणपंथियों की ही भाषा समझ में आती है, इसलिए पहले को देवऋण कहा जा सकता है, जो देवताओं की योनि में उपजे वित्त मंत्रालय के अधिकारियों, बड़े-बड़े बैंकरों, अर्थशास्त्रियों, ऋण-वितरण-सामारोहों की अध्यक्षता करनेवाले खादीपोश बहुरूपियों और चपरकनाती अफसरों की कृपा से प्राप्त होता है। दूसरा ऋण, उसी पुराणपंथी भाषा में पितृ-ऋण है जो पिता की कृपा से किसी जाति-विशेष में उत्पन्न होने के कारण मुंडन, छेदन, ब्याह, गौना, दसवाँ, तेरहीं आदि रस्मों को निपटाने के लिए फिर उन्हीं दुलारी सहुआइनों, उन्हीं दातादीनों, उन्हीं मंगरू साहुओं से लेना पड़ता है जो अब पहले से भी ज्यादा चतुर हैं, जिनके लड़के अब आई. ए. एस. में घुसकर या बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री लेकर उसी तबके में घुस रहे हैं जो देव-ऋण बाँटनेवालों का है। ‘उन्नीस सौ चौरासी’ का लेखक जार्ज आर्वेल इसे अपनी ‘न्यूस्पोक’ में ‘देपिसह’ कह सकता था-देव-पितृ-सहायता। ऋण अब रहा ही नहीं, जो भी ऋण देता है वह वास्तव में सहायता दे रहा है। और चूँकि देव-ऋण और पितृ-ऋण देनेवाले-दोनों ही किस्म के लोग एक ही वर्ग और एक ही पार्टी के हैं, इसलिए होरी को इन ऋणों से अलग-अलग तंत्र में भले ही फर्क मालूम पड़े, ऋण देनेवाले जानते हैं कि वे एक ही बिरादरी के हैं। इस तरह, दो कामों के लिए दो तरह का ऋण दो अलग-अलग रास्तों से आने के बावजूद चाहे सहकारी या सरकारी बैंक हो या पुश्तैनी सूदखोर, वसूली के मामले में दोनों एक-से घातक हैं, दोनों ही खेत कुर्क करा सकते हैं, दोनों ही हवालात भिजवा सकते हैं। यह सूदखोरी व्यवस्था का द्वित्व (डाइकॉटमी) नहीं है, सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के दुर्दांत सूदखोरों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है। संक्षेप में 1935 में होरी को जहाँ नदी के इस किनारे पर पड़े मगरमच्छ निगलने को झपटते थे, वहीं अब उसे दोनों किनारों पर अलग-अलग शक्लवाले, पर एक ही नस्ल के मगरमच्छों का सामना करना पड़ता है। होरी की यह अजीब नियति है कि वह इस नदी को छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता।
प्रोलफीड में 4500 करोड़ रुपए के खेतिहर ऋण का हवाला होरी के गले में हड्डी की तरह अटक जाता है। इस खेतिहर ऋण ने उसके साथ जो किया है, वैसा पंडित दातादीन और सेमरी के सारे साहूकार मिलकर भी नहीं कर सकते थे। उनके सामने कम से कम घिघियाया जा सकता था, कोई दुलारी सहुआइन कुछ देर के लिए द्रवित भी हो सकती थी, पर इसके सामने कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कानूनबद्ध चेहरारहित साहूकार कभी उसके सामने आता ही नहीं है, उसके अस्तित्व का पता कुछ सरकारी कारकुनों और अखबार में छपनेवाली कुर्की के इश्तहारों से ही चलता है।
इस साहूकारी व्यवस्था के शिखर पर बैठे हुए जो परम उत्साही व्यवसाय-विशेषज्ञ शहरी बाबू हैं, जो इस देश की राजनीतिक संध्या के निर्जन सुनसान में अचानक भारत-भाग्य-विधाता बन गए हैं, वोट पकड़ने के तंत्र में कर्ज की राजनीति को खूब समझते हैं। पर वे यह नहीं समझते कि गरीबी सबसे पहले इन्सान की पहल करने की शक्ति को नष्ट करती है। सर्वहारा का मकरुज होना, वह अच्छी नस्ल की भैंस के कारण हो या बिरादरी के भोज के लिए, कोढ़ में सिर्फ खाज का काम करता है।
झिंगुरीसिंह के लिए अपनी उम्दा जोत के लिए, जो चकबंदी के कारकुनों के कारण और भी उम्दा हो गई है, ट्यूबवेल के लिए कर्ज लेना दीगर बात है। वह समृद्ध को समृद्धतर बनाता है। वह कर्ज वापस न कर सकें, तब भी अपनी समृद्धि और राजनीतिक पुर्जेबाजी के सहारे वह अपनी जोत बचा ले जाएगा। पर ठर्रे में गनगनाते दिमाग के साथ प्रोलफीड खाते हुए इस होरी के साथ 1984 में क्या हुआ।
कुछ साल पहले उसे, जैसे सुअर के बच्चे को चार आदमी दबाकर उसका गला रेतते हैं, एक नसबंदी शिविर में जाकर नसबंदी करानी पड़ी थी। उसकी एक नस काट दी गई, पर उसे ज्यादा दुख नहीं हुआ था। जबसे वह पैदा हुआ, एक-एक करके उसकी नसें ही काटी जा रही थीं। उसने इससे भी समझौता कर लिया। पर कुछ ही साल बाद नसबंदी-शिविरों की जगह खेतिहर-ऋण के शिविरों ने ले ली। अब विकास-खंड के कर्मचारी और तहसील का पूरा अमला गाँव पर गिद्धों की तरह उतर रहा था। सेमरी के पास के गाँव बिलारी में, जहाँ पहले वहाँ के जमींदार रायसाहब ‘गोदान’ के 1934 में रामलीला का जलसा कराते थे, उनके लड़के ने, जो विधायक भी थे और जिन्हें विधायक से मंत्री बनना था, साल भर पहले ऋण-वितरण शिविर लगवाया था, जिसका लक्ष्य खेतिहरों में बीस लाख रुपए का ऋण बाँटना था। दिल्ली का खादीपोश युवा नेता जो देश की अखंडता और एकता की लगातार बातें करता था और जिसकी बातें होरी की पहुँच से बाहर थी, पूरे चेहरे को मुस्कान का अगियाबेताल बनाकर लोगों को ऋण बांट रहा था। बैंक के हाकिम बरसाती मेंढ़कों की तरह उसके आसपास फुदक रहे ते। उसी जलसे में होरी पर भी कुछ हजार रुपयों का कर्ज लाद दिया गया था।
उसे भैंस की जरूरत नहीं थी। 1935 के होरी ने एक गाय खरीदी थी; उधार पर, वह किस्सा अभी तक लोगों को याद है। सबकुछ ठीक था पर उसके भाई ने डाह के मारे गाय को जहर दे दिया था। उसी झमेले में गाय का पुराना मालिक भोला उसके बैल खोल ले गया था। अब, 1984 में, होरी में कर्ज लेकर भैंस खरीदने की दम न थी। पर तहसीलवाले नहीं माने। कोई लंबा-चौड़ा हिसाब दिखाकर उन्होंने बताया कि भैंस के दूध से, बैंक का कर्ज चुकाते हुए भी, होरी को कई सौ रुपए महीने का मुनाफा होगा। पर यह होरी भाग्य के बारे में अब और भी चौकन्ना हो गया था। वह जानता था कि ऐसी खूबसूरत स्कीम को भीतर-ही-भीतर खाने के लिए कोई न कोई कीड़ा जरूर लगा होगा। वह कीड़ा ग्रामसेवक था जिसने कर्ज का एक हिस्सा कमीशन में कटवा लिया था, दूसरा पशु-चिकित्सक था जिसने एक बड़े मेले में अच्छी नस्ल की भैंसों की सामूहिक खरीद कराके उसे तीन थन वाली एक भैंस का पगहा पकड़ा दिया था।
भैंस बीमार हालत में आज भी होरी के दरवाजे पर है। 1935 में उसकी गाय को उसके भाई ने जहर दिया था। आज, 1984 में उसकी जिंदगी में इन ऋण-वितरण शिविरवालों ने इस भैंस के बहाने न जाने कितना जहर घोल दिया है, वसूली के लिए कुर्की आने ही वाली है।
यह देव-ऋण का हाल है। पितृ-ऋण के लिए यानी, सोना की शादी के लिए उसे रुपयों की जरूरत है; अब दहेज ठीक से न दिया जाए तो लड़की पर मिट्टी का तेल छिड़ककर उसे जला देते हैं। होरी को दहेज के लिए कर्ज चाहिए। पर इस काम के लिए राष्ट्रीयकृत बैंक, सहकारी बैंक, ग्रामीण बैंक-सब बेकार हैं। उधर आज गाँव में दु्लारी सहुआइन और मंगरू साह भी नहीं है। डकैतों के डर से वे शहर के एक घने मुहल्ले में-जो साहूकारों की पुश्तैनी बस्ती है-जा बसे हैं। इन साहूकारों के भव्य भवन बने हैं, वे टेलीफोन पर कारोबार करते हैं। खेतिहर-ऋण-वितरण-शिविरवाला खादीपोश नेता इनके यहाँ दावत खाने आता है। होरी की लड़की की शादी के लिए बैंक ऋण नहीं देगा, यह ऋण उसे इन्हीं सूदखोरों से मिलेगा और इनकी शर्तें मंगरू साह की शर्तों से भी ज्यादा भयावह है।
पंडित मातादीन को यह टी.वी. सेट, बहुत किफायती लागत पर, पार्टी के प्रचार के लिए मिला है। होरी और वैसे ही दस-पाँच होरियों को ‘प्रोलफीड’ के साथ छोड़कर वे मकान के अंदर चले गए हैं-उसी काम के लिए चोरी से चुराया हुआ महुए का ठर्रा पीने को। बाहर आकर यह देखकर कि टी.वी. पर कोई ऐसी गजल आ रही है, जिसमें गले लग जाने और बोसा लेने की इफारत है, वे सेट बंद कर देते हैं,। फिर लोगों को धर्मचारी जी का उपदेश, उनकी तांत्रिक सिद्धियों की महत्ता और उनके रचे भजनों का पाठ सुनाने लगते हैं।
पर वे तो चमार हो गए थे, फिर से पंडित कैसे हो गए ? ऐसे। सिलिया और उनका बेटा रामू पढ़ने में अच्छा निकला। उसने अपनी माँ की जाति को अपनी जाति बनाकर सुरक्षित जगहों में से आबकारी के इंस्पेक्टर की एक जगह ले ली। लड़के के इंस्पेक्टर बनते ही गाँववालों ने तय किया कि अब मातादीन को चमार नहीं कहा जा सकता, इसलिए उन्हें पंडितजी कहा जाने लगा। उनकी चुटिया अचानक बढ़ी ही नहीं, उठ भी गई, उनके शरीर पर तीन धागे फिर से वापस आ गए। जिस एक गाँव ने बेटे को चमार बनाकर इंस्पेक्टर बनाया, उसी ने बाप को फिर से ब्राह्मण बना दिया। अब मातादीन के यहाँ सरकारी अमलों की आमद-रफ्त बढ़ रही है। पार्टी की स्थानीय शाखा के वे अध्यक्ष नामजद हुए हैं।
ऐल्डास हक्सले के ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में यौनाचार एक अच्छा और अनिवार्य कर्त्तव्य है, जार्ज आर्वेल के ‘उन्नीस सौ चौरासी’ में यौनाचार एक घटिया, गर्हित काम है। आज होरी के 1984 में सिर्फ बलात्कार से प्राप्त यौन-संतोष ही चरम संतोष है। ‘गोदान’ के 1935 में सोना, रूपा, सिलिया, झुनिया गाँव में मुक्त पक्षियों की तरह रहती थीं। खुद जिनके लिए उनके मन में आकर्षण हो, उन्हें छोड़कर बाकी सबसे भाईचारे के संबंध थे। शहर में पढ़नेवाले झिंगुरीसिंह के लड़कों ने ही उन दिनों भविष्य का इशारा दिया था, जब उनके बारे में कहा गया था कि शहर में पढ़ने जाकर उन्होंने गाँव की बिरादरी का नेम-धरम भुला दिया है।
अब होरी को सिर्फ सरकारी कर्ज की ही चिंता नहीं है, घर में जवान लड़कियों का बोझ उसे दिन-रात कुचलता रहता है। वह जमाना नहीं रहा जब गाँव के किसी लड़के की बदचलनी पर पंचायत बैठती थी, हर्जाना भरना पड़ता था। अब वह लड़का पंचायत को गाली देकर शहर भाग सकता है, वहाँ रिक्शा चलाकर किसी भी खेतिहर मजदूर से ज्यादा कमा सकता है।
चारों ओर असुरक्षा है। शाम से ही घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सूरज डूबते ही सन्नाटा छा जाता है। कभी-कभी कुत्ते भौंकते हैं, जिससे अँधेरे का आतंक और गहराने लगता है। चारों ओर के जंगल और बाग-सरकारी वनमहोत्सवों के ढकोसलों के बावजूद कट गए हैं। अब गीदड़ और चमगादड़ तक नहीं बोलते। ‘पूस की रात’ जैसी कहानी में जाड़ा ही अब सबसे बड़ा यथार्थ बचा है। हिरनों और नीलगायों के झुंड अब फसल चरने नहीं आते। उनकी जगह गिरोहबंद डकैतों ने ले ली है। वे किसी भी गाँव से निकल सकते है। वे सिर्फ लूटपाट करने नहीं आते, जवान बेटियों और बहुओं के लिए भी आते हैं। वे उनकी काम-क्षुधा का सबसे बड़ा आहार हैं। बूढ़ें संपाती की तरह होरी उन्हें बचाने में असमर्थ है।
मातादीन समझाते हैं: लड़कियों को कुछ दिन के लिए शहर में गोबर के पास छोड़ आओ। शादी तय हो जाए, तब बुला लेना।
बड़ी-बड़ी तरक्कियाँ हुई हैं। पक्के मकान, बिजली, सड़के, स्कूल..पर होरी, उसके जैसे लाखों खेतिहर मजदूर और करोड़ों आदिवासी- इन सबके लिए 1984 आज भी जार्ज आर्वेल का दु:स्वप्न जैसा ही है। आजादी के बाद के आर्थिक उभार और राजनीति का फायदा बहुतों को मिला होगा, पर होरी जैसे खेतिहर मजदूर के लिए न कोई मिनिमम वेजेज़ ऐक्ट लागू होनेवाला है, न वर्कमेंस कंपेसेशन ऐक्ट। न बीमारी में उसकी व्यथा सुननेवाला कोई डाक्टर है न तमंचे की चोट से बचानेवाला कोई थानेदार। उसके बारे में सत्तापतियों की सिर्फ तीन चिंताएँ हैं: उसे बच्चा पैदा करने से कैसे रोका जाए भूदान में मिले एक बीघा ऊसर के लिए उसको ज्यादा-से-ज्यादा विकास-ऋण कैसे पकड़ा दिया जाए और भले ही डकैतों की गोली लगने पर उसे थाने पर रपट लिखाने के लिए चौदह किलोमीटर चलना पड़े, उसका वोट लेने के लिए पोलिंग स्टेशन उसके दरवाजे पर कैसे खड़ा कर दिया जाए। आतंक, असुरक्षा, कर्ज और दरिद्रता से जूझते हुए होरी को अब राहत के नाम पर महुए का अवैध ठर्रा-भर बचा है, जो जार्ज आर्वेल के 1984 में विस्टन स्मिथ को भी विक्टरी जिन के नाम से मिला था, और मिला है पंडित मातादीन के घर का टी.वी. सेट, जो विंस्टन स्मिथ के खुद अपने घर में लगा था। ऐल्डोस हक्सले ने शायद इसी की कल्पना करके आर्वेल को अपने एक पत्र में लिखा था:
‘‘अगली पीढ़ी आते-आते, मुझे लगता है, दुनिया के शासकगण यह जान जाएँगे कि लोगों पर शासन करने के लिए उनमें बालबुद्धि और मृदुता का उद्दीपन क्लबों और जेलों से ज्यादा कारगर साबित हो सकता है और ठोकर और कोड़े मारकर लोगों को काबू में लाने के बजाय प्रेमपूर्वक उनको अपनी दास-भावना में आसक्त बनाकर शक्ति की प्रबल आकांक्षा को मजे से संतुष्ट किया जा सकता है।’’
प्रोलफीड में सबकुछ गलत नहीं है। बेशक, फिल्म एक्टर, संगीतकार, प्रबंध-विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, अंतरिक्षयात्री, उद्योगपति, दार्शनिक, न्यायविद् हमारी जिंदगी को समृद्धतर बनाने में लगे हैं, पर होरी की बदकिस्मती कहिए, उस जिंदगी पर हुकूमत छुरेबाजों, दलालों, सूदखोरों बौद्धिक नपुंसकों, डकैतों, संवेदनहीन हाकिमों और राजनीतिक मौकापरस्तों की है।
________श्रीलाल शुक्ल, कुछ जमीन पर कुछ हवा में से अंश साभार
Sunday, August 10, 2008
कविता के कार्य
सभ्यता के विकास से मानव जीवन अनेक आवरणों से ढक और जकड़ जाता है. कविता इन आवरणों को भेदती है और भावों को उनके मूल या आदिम रूपों तक ले जाती है. उदाहरण के लिए :
कविता सृष्टि के व्यापक विस्तार के साथ भावों का विस्तार करती है. पशु की भावना संकीर्ण और केवल उसके तात्कालिक रूप तक सीमित होती है. किन्तु मनुष्य की भावना जीव जगत् ही नहीं, पदार्थों तक में फैली होती है. इस प्रकार कविता मनुष्य के संपर्क में आने वाली समस्त सृष्टि के साथ उसके भावों का संयोग करती है.
कविता को भावयोग कहा गया है. कविता मनुष्य की भावसत्ता के सर्वोत्त्म रूप का साक्षात्कार कराती है. वह मनुष्य को स्व-पर की संकीर्ण सीमा के ऊपर उठा देती है.
कविता का एक कार्य आनंद प्रदान करना भी है. लेकिन कविता के आनंद का मूल्य तभी है जब वह जीवन के किसी मार्मिक तथ्य का उद्घाटन भी करे.
.................प्रो. नित्यानंद तिवारी, साभार
किसी का कुटिल भाई उसे सम्पत्ति से एकदम वंचित रखने के लिए वकीलों की सलाह से एक नया दस्तावेज़ तैयार करता है. इसकी ख़बर पाकर वह क्रोध से नाच उठता है. प्रत्यक्ष व्यावहारिक दृष्टि से तो उसके क्रोध का विषय है वह दस्तावेज़ या कागज़ का टुकड़ा. पर उस कागज़ के टुकड़े के भीतर वह देखता है कि उसे और उसकी संतति को अन्न वस्त्र न मिलेगा. उसके क्रोध का प्रकृत विषय न तो वह कागज़ का टुकड़ा है और न उस पर लिखे हुए काले-काले अक्षर. ये तो सभ्यता के आवरण मात्र हैं. अत: उसके क्रोध में और कुत्ते के क्रोध में, जिसके सामने का भोजन कोई दूसरा कुत्ता छीन रहा है, काव्य दृष्टि से कोई भेद नहीं है.इस प्रकार कविता सभ्यता के आवरणों को भेद कर भावों के आदिम रूपों को हमारे सामने लाती है.
कविता सृष्टि के व्यापक विस्तार के साथ भावों का विस्तार करती है. पशु की भावना संकीर्ण और केवल उसके तात्कालिक रूप तक सीमित होती है. किन्तु मनुष्य की भावना जीव जगत् ही नहीं, पदार्थों तक में फैली होती है. इस प्रकार कविता मनुष्य के संपर्क में आने वाली समस्त सृष्टि के साथ उसके भावों का संयोग करती है.
कविता को भावयोग कहा गया है. कविता मनुष्य की भावसत्ता के सर्वोत्त्म रूप का साक्षात्कार कराती है. वह मनुष्य को स्व-पर की संकीर्ण सीमा के ऊपर उठा देती है.
कविता का एक कार्य आनंद प्रदान करना भी है. लेकिन कविता के आनंद का मूल्य तभी है जब वह जीवन के किसी मार्मिक तथ्य का उद्घाटन भी करे.
.................प्रो. नित्यानंद तिवारी, साभार
Monday, August 4, 2008
हमारा भी हिस्सा होना चाहिए
बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उसमें कुछ नमक भी है
जो बच रहेगा
टपक रहे ख़ून में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उसमें कुछ लोहा भी है
जो बच रहेगा
एक दिन नमक और लोहे की कमी का शिकार
तुम पाओगे ख़ुद को और ढेर सारा
ख़रीद भी लाओगे
लेकिन तब पाओगे कि अरे
हमें तो अब पानी भी रास नहीं आता
तब याद आएगा वह पानी
जो तुम्हारे देखते-देखते नमक और लोहे का
साथ छोड़ गया था
दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है
तो फिर दुनिया भर में बहते हुए ख़ून और पसीने में
हमारा भी हिस्सा होना चाहिए.
--------------नरेश सक्सेना, समुद्र पर हो रही है बारिश, साभार
Friday, July 18, 2008
भारतीय संस्कृति और युवा वर्ग

संस्कृति अपनी भाषा में निबद्ध होती है. भाषिक परिवर्तन संस्कृति के स्वरूप को भी परिवर्तित करता है, और भाषा की मृत्यु संस्कृति को भी मारती है. भारतीय संस्कृति भारत की बहुभाषायी अस्मिता पर आधारित बहुआयामी संस्कृति की एकता की परिचायक है. ऐसे में भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी का वर्चस्व भारतीय संस्कृति में भी पश्चिम के वर्चस्व को स्थापित करता है. जिस तरह भाषिक अभिव्यक्ति मिक्स होती जा रही है, उसी तरह सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी. आज के युवाओं के पहनावे, साज-श्रृंगार, संवाद-विवाद का तरीका, सुख और सुविधाओं के आधारभूत तत्त्व और परम्परागत रीति-रिवाजों के प्रदर्शन का स्वरूप भारतीय संस्कृति की नव्यात्मकता को स्पष्ट कर देता है. ऐसे में अमिताभ बच्चन का यह कथन हास्यास्पद लगता है कि
आज हर बात पर सोचने और काम करने के तरीकों और दृष्टिकोण में बदलाव ज़रूर आ गया है. इस बदलाव को संस्कृति के बदलाव से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.
------------------------------ (आउटलुक -40, पृ0-23)
भारतीय संस्कृति एक रंगमहल है जिसमें अनगिनत दरवाजे हैं. जवाहरलाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था और मनमोहन सिंह के उदारवाद ने क्रमश: इन दरवाजों को खोल दिया. समय के साथ संस्कृति के रंग-रूप बदलते गए, जिसे किसी ने पापुलर कल्चर और मास कल्चर पुकारा तो किसी ने अपसंस्कृति कहा. समकालीन भूमंडलीकृत उद्योगों ने एक तरफ भारत के अर्थशास्त्र को बदल दिया है तो दूसरी तरफ सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को भी. संस्कृति का विराट उद्योग जगत अत्यंत उद्धत और विकसित है. जिसके माध्यम से उत्पादित संस्कृति को छुट्टा साँड भी कहा जाता है.
भारतीय युवाओं पर संस्कृति के इस वर्तमान स्वरूप का न केवल प्रभाव पड़ता है वरन् प्रभाव की रूपरेखा उद्योगों के स्वरूप को भी परिवर्तित कर देती है. यही कारण है कि भारतीय संस्कृति हिन्दुस्तान की जातीय पहचान न रहकर, निर्यातित अथवा आयातित माल का परम्परागत संस्कृति के साथ री-मिक्स आइटम हो जाती है. इस आइटम में जातिगत कट्टरता की शिथिलता, प्रेम की पाबंदियों का तिरस्कार सकारात्मक है तो अश्लील चाहतों, नंगई हरकतों के साथ स्वार्थ की प्रबलता भी विद्यमान है, जो मानवीय चेतना और मूल्यों को कमज़ोर करती जा रही है. ऐसा पूर्ववर्ती दौर में भी था, लेकिन इसके दायरे हुआ करते थे. आज दायरों को या तो अभाव है, अथवा दायरों के भी दायरे हैं. सांस्कृतिक बाज़ारतंत्र में नैतिक दायरों की सख्त ज़रूरत है.
फिल्में, टी.वी., सूचना, फैशन, पेज-थ्री, खेल, विज्ञापन, धार्मिक आचरण आदि क्षेत्रों के माध्यम से युवा वर्ग की जीवन-शैली और जीवन-मूल्य निर्धारित होता है, जिससे संस्कृति परिवर्तित, विकसित एवं पुनर्रचित हो पाती है. इसीलिए यह क्षेत्र बाज़ारतंत्र की गतिविधियों को तय करता है जो केवल लाभ के एकल उद्देश्य से गतिशील रहता है. फलत: संस्कृति, आदर्शतम मूल्यों से परे व्यक्तिगत-मूल्य-विधानों की नियंता बन जाती है. आज भारतीय युवक यह कहते ना के बराबर दिखते हैं कि मैं गरीबों का दिल, हूँ वतन की ज़ुबाँ. अक्सर यही कहते दिखते हैं कि मैं अमीरों से अमीर, होऊँ अमेरिकन इंसाँ. वह भी अंग्रेजी में.
स्पष्ट है कि समकालीन युवाओं पर व्यक्तिगत-मूल्य-विधानों का प्रभाव अधिक है, जिसे अर्जित करने की कोई निर्धारित अथवा नैतिकजन्य प्रविधि नहीं है. ऐसे में धूमिल की ये पंक्तियाँ प्रासंगिक लगती हैं कि
ज़िंदा रहने के पीछे यदि सही (मानवीय) तर्क नहीं है
तो रामनामी बेचकर या रंडियों की
दलाली करके रोजी कमाने में कोई फ़र्क नहीं है.
Monday, July 14, 2008
यथार्थ जगत और साहित्य

साहित्य और यथार्थ जगत के संबंध पर विचार करना इसलिए आवश्यक होता है कि यूरोप और अमरीका के अनेक साहित्यकार यथार्थ जगत के अस्तित्व या महत्त्व को अस्वीकार करके अपने मानस से साहित्य-सृष्टि करने का दावा करते हैं. इसके लिए वे भाववादी दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं का सहारा लेते हैं. इस सबका प्रभाव हिंदी साहित्य पर भी पड़ रहा है और अनेक हिंदी लेखक भारतेंदु से लेकर प्रेमचन्द तक के साहित्य-विकास को बढ़ाने के बदले उसे किसी न किसी रूप में अस्वीकार करते हैं और विदेश की उन भावधाराओं को ग्रहण करते हैं जिनमें लेखक के अहम् की तुलना में समग्र संसार नगण्य ठहरता है.
प्लैटो, बर्कले, हेगल – यूरोप के इन भाववादी दार्शनिकों का प्रभाव वहाँ समाप्त नहीं हो गया. समाप्त होना तो दूर, आधुनिक भौतिकशास्त्र (फिजिक्स) की प्रगति से कुछ वैज्ञानिकों ने भी यह परिणाम निकाला है कि बाह्य जगत का अस्तित्व नहीं है. हाइजेनवर्ग और प्लांक के अनुसंधानों ने विज्ञान में संदेहवाद या अज्ञेयवाद को प्रश्रय दिया. पहले पदार्थ और शक्ति (मैटर और एनर्जी) में अंतर माना जाता था. अब पता चला कि पदार्थ की गति लहरों के रूप में होती है.
प्रत्येक लहर (वेवलेंथ) का संबंध शक्ति (एनर्जी) के एक निश्चित माप से रहता है. शक्ति के इस माप को क्वांटम कहते हैं. यह क्वांटम केवल लहर की माप (वेवलेंथ) पर निर्भर रहता है. क्वांटम के बारे में धारणा यह है कि वह प्रति सेकेंड रेडिएशन के स्पंदनों के अनुपात में होता है.
संदेहवाद के उत्पन्न होने का कारण यह है कि प्रकृति में कण और लहर की पुरानी धाराओं के बदले हमें ऐसे पदार्थ के दर्शन होते हैं जो कण और लहर दोनों है. यदि कण की स्थिति का ही पता लगाना हो तो पुरानी पद्धति से पता लगा लिया जाए. किंतु जब वह कण लहर भी है, तब स्थिति का पता कैसे लगे?
साथ ही यथार्थ जगत में हस्तक्षेप किए बिना उसे जानना संभव नहीं होता और हस्तक्षेप करते ही उसकी यथार्थता दूषित हो जाती है. इस संबंध में मौरिस कौर्नफोर्थ आदि मार्क्सवादी विचारकों का कहना है कि पुरानी नाप-जोख की पद्धति से यह कठिनाई उत्पन्न होती है. इससे परिणाम यह नहीं निकलता कि हम यथार्थ जगत को जान नहीं सकते वरन यह निकलता है कि उसे जानने की पुरानी पद्धति बदलना आवश्यक है. (देखिए मार्क्सिस्ट क्वार्टरली, जुलाई, 1954 में आर्थर सडैबी और मौरिस कौर्नफोर्थ का लेख ‘क्वांटम भौतिकशास्त्र की दार्शनिक समस्याएँ’.)
बर्ट्रेंड रसेल जैसे दार्शनिक दर्शनशास्त्र का मुख्य कार्य तार्किक विश्लेषण समझते हैं. उनके लिए सारे भ्रमों की जड़ भाषा का असंगत प्रयोग है. इस भ्रम को दूर करने का परिणाम यह होता है कि संसार ही भ्रम सिद्ध हो जाता है. विशुद्ध चेतना का अनुसंधान करनेवाले अनेक दार्शनिक बाह्य जगत के अस्तित्व से इनकार करते हैं.
लोग बात करते हैं अस्तित्ववाद की लेकिन इनकार करते हैं वाह्य जगत के अस्तित्व से. अस्तित्ववाद को प्रभावित करनेवाले किर्कगार्ड का कहना था, ‘सत्य केवल आत्मगत होता है’ (Truth is subjectivity)। इस प्रकार वस्तुगत सत्य को अस्वीकार कर दिया गया. फिलिप मैरे जैसे अस्तित्ववादी नीत्शे को भी अस्तित्ववादी मानते हैं. ‘‘नीत्शे किर्कगार्ड के बारे में कुछ न जानता था किंतु व्यक्ति की चिंता, निर्णय और भावना बल देने के कारण वह अस्तित्ववादी था.’’ नीत्शे के इस अस्तित्ववादी ने जर्मनी में युद्धकामी शक्तियों को प्रोत्साहन दिया जिससे दो बार विश्व-युद्ध हुआ. विश्व-युद्ध के मूल कारण आर्थिक और राजनीतिक थे. इन कारणों का ही एक परिणाम नीत्शे का व्यक्तिवाद था जिसने युद्ध-प्रचार में सहायता दी.
बीसवीं सदी में पूँजीवाद का विकृत दर्शन व्यक्तिवाद पर निर्भर है. साधारणत: वह मानवप्रगति का विरोध करता है; विशेष परिस्थितियों में वह युद्ध-प्रचार में सहायक भी हो जाता है.
कैथलिक और नास्तिक, दोनों प्रकार के अस्तित्ववादियों का सामान्य गुण बतलाते हुए सार्त्र ने लिखा है, ‘‘उनका विश्वास है कि तत्त्व पहले अस्तित्व है; दूसरे शब्दों में हमें शुरूआत आत्मगत पक्ष से करनी चाहिए.’’ यह आत्मगत पक्ष क्या है ? ‘‘प्रत्येक मनुष्य एक सार्वजनीन धारणा, मानव-संबंधी धारणा का विशेष उहाहरण है.’’ इससे यह न समझना चाहिए कि विशेष मानव की तुलना में सामान्य मानवता महत्त्वपूर्ण है. आशावादी विचारकों से भी अपनी भिन्नता विज्ञापित करते हुए सार्त्र ने लिखा है, ‘‘सत्य इसके सिवा और कुछ नहीं है कि मैं सोचता हूँ, इसलिए हूँ. यह उस चेतना का निरपेक्ष सत्य है जो अपने को प्राप्त करती है. अपने को प्राप्त करने के इस क्षण के बाहर मनुष्य के संबंध में जो भी सिद्धांत प्रतिपादित किया जाता है, वह सत्य का हनन करता है.’’ सार्त्र के अनुसार यह सिद्धांत मानव- गौरव के अनुकूल है क्योंकि इससे मनुष्य पदार्थ नहीं बन जाता. ‘‘सभी तरह के भौतिकवाद विचारक को बाध्य करते हैं कि वह सभी मनुष्यों को-अपने को भी-पदार्थ समझे अर्थात उसे पूर्वनिश्चित प्रतिक्रियाओं का परिणाम समझे जो मेज, कुर्सी या पत्थर के गुणसमूहों और संघटनों से भिन्न नहीं है.’’ नैतिक क्षेत्र में अच्छे-बुरे का निर्णय भी व्यक्ति ही करता है; जिस समाज का वह सदस्य है, उसे कुछ कहने का अधिकार नहीं है. ‘‘यदि मैं किसी काम को अच्छा समझता हूँ तो वह मैं ही हूँ जो उसके अच्छे-बुरे होने का निर्णय करता हूँ.’’ इस प्रकार मनुष्य परम असामाजिक प्राणी ठहरता है. साहित्य में साधारणीकरण की गुंजाइश ही नहीं रहती. सार्त्र की इस व्यक्तिवादी विचारधारा का असर अज्ञेय, धर्मवीर भारती प्रभृति आत्मोपलब्धि में तल्लीन निरपेक्ष व्यक्तिवाले सज्जनों पर देखा जा सकता है.
सार्त्र ने अपनी विचारधारा को सभी तरह भौतिकवाद से भिन्न ठीक ही बतलाया है. अस्तित्ववाद पुराने भाववाद- चेतना को सत्य और संसार को मिथ्या समझनेवाली विचारधारा-का ही एक रूप है. भाववाद के अनेक रूप अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते हैं वैज्ञानिक भौतिकवाद को। भाववादियों के अनुसार वैज्ञानिक भौतिकवाद में आस्था रखनेवाले लोग मनुष्य में आस्था खो देते हैं. आस्था का प्रश्न हल करना है तो समाज निरपेक्ष अहम् में विश्वास करो. कला और साहित्य को उसी का विस्फोट मानो. कुछ अन्य मित्र जो संसार को मिथ्या नहीं कहते, वैज्ञानिक भौतिकवाद को दर्शन ही नहीं मानते. उनकी समझ में वैज्ञानिक भौतिकवाद जगत के स्वरूप की व्याख्या नहीं करता, न वह ज्ञान की समस्या हल करता है. प्रतीति में भी तो होता है; फिर कैसे जानें, कौन-सी प्रतीति भ्रम है और कौन-सी वास्तविक ज्ञान? वैज्ञानिक भौतिकवाद व्यवहार पर बल देता है. इसे कुछ विद्वान शुद्ध चेतना का अपमान समझते हैं. ज्ञान का साक्ष्य चेतना के अंदर ही होना चाहिए; बाहर हुआ तो फिर दार्शनिकता कहाँ रही.
वैज्ञानिक भौतिकववाद के अनुसार मनुष्य प्रकृति की उपज है और विचार चेतना मानव-मस्तिष्क की उपज। मस्तिष्कहीन विचार और चेतना का अस्तित्व केवल कल्पना की वस्तु है. भौतिकता से परे चेतना का निवास नहीं है. जिस पदार्थ का गुण चेतना है, उसमें विद्युत-प्रहारों द्वारा हस्तक्षेप करके चेतना के अनेक अंगों को नष्ट किया जा सकता है. सर में चोट लगने से स्मृति का नष्ट होना साधारण अनुभव-क्षेत्र की बात है.
चेतना मस्तिष्क में निहित पदार्थ का गुण है, प्रकृति के एक अंश का गुण है, इसलिए वास्तविक विचार केवल चिंतन द्वारा अपने भीतर से उत्पन्न नहीं किए जा सकते. सही विचार के लिए मानव-चेतना और बाह्य जगत का सम्पर्क आवश्यक होता है. इस कारण ज्ञान का आधार मनुष्य का प्रत्यक्ष अनुभव है. अपने व्यवहार से ही मनुष्य अपना ज्ञान समृद्ध करता है. ज्ञान से वह व्यवहार-क्षेत्र में आगे बढ़ता है. इस आगे बढ़ने के नए अनुभव से वह अपने ज्ञान को फिर से समृद्ध करता है. इस प्रकार व्यवहार-क्षेत्र के विकास के कारण मनुष्य का ज्ञान नित विकसित होता रहता है. वैज्ञानिक भौतिकवादी के लिए व्यवहार-क्षेत्र से संन्यास केवल आत्मचिंतन से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती. ‘‘जो लोग समझते है कि आँख मूँदकर ध्यान या समाधि लगाने से भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल की बातें सूझने लगती हैं उन्हें इस पर ध्यान देना चाहिए.’’ ये शब्द रामचन्द्र शुक्ल ने ‘विश्व-प्रपंच’ की एक पाद-टिप्पणी में लिखे थे. जिन मूल वाक्यों पर उन्होंने टिप्पणी लिखी थी वे ये हैं, ‘‘अत: बिना इस प्रकार के बाह्य निरीक्षण के केवल आत्म-निरीक्षण-द्वारा निश्चित मनो व्यापार संबंधिनी बातें बाह्य पक्की नहीं समझी जा सकतीं. पर वाह्य निरीक्षण की पूर्णता के लिए शरीर-विज्ञान, अंगविच्छेद शास्त्र, शरीराणु-विज्ञान, गर्भ विज्ञान और जीव-विज्ञान इत्यादि का यथावत ज्ञान होना चाहिए.’’
बाह्य निरीक्षण आवश्यक है. केवल आत्म-निरीक्षण द्वारा मनोव्यापार-संबंधी –अर्थात चेतना संबंधी बातें पक्की नहीं समझी जा सकतीं. आँख मूँदकर ध्यान लगाने और भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञान का दावा करनेवालों के हाथ आत्म-प्रवंचना ही लगती है.
वैज्ञानिक भौतिकवाद व्यवहार, अनुभव और प्रयोग से परे इलहाम द्वारा ज्ञान-प्राप्ति का दावा नहीं कर सकता. जो दार्शनिक व्यवहार से दूर रहकर विशुद्ध चिंतन से पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं या ऐसा ज्ञान प्राप्त करने का दावा करते हैं, वे अवश्य या तो स्वयं पैगंबर होंगे या किसा पैगंबर के सहारे उन्हें यह गुप्त ज्ञान प्राप्त हुआ होगा. उनके ज्ञान में उन्हीं को आस्था हो सकती है जो श्रद्धालु भक्त हैं; इलहाम की बातों को यह संदेह से देखनेवाले, व्यवहार द्वारा ज्ञान-अज्ञान का भेद करनेवाले वैज्ञानिकों को उस पर विश्वास नहीं हो सकता. भाववादी दर्शन ज्ञान की पूर्ण व्यवस्था देने का दावा करते हैं. भौतिकवादी दर्शन पूर्ण होने का दावा नहीं कर सकता क्योंकि वह ज्ञान को विकासमान समझता है. विश्व क्या है, पदार्थ का मूल रूप क्या है, जीव-अजीव का संबंध कैसा है, इन प्रश्नों के बारे में भौतिकवादी दर्शन विज्ञान से ऊपर उठकर, शुद्ध चिंतन के बल पर, निर्णयात्मक उत्तर नहीं देता. विश्व के प्रति उनका दृष्टिकोण, उसके तर्क और चिंतन की पद्धति वैज्ञानिक अनुभवों पर निर्भर है और इसलिए वह वैज्ञानिक प्रगति में सहायक होती है.
इंगलैंड के बेकन और लॉक जैसे चिंतकों ने अनुभव और व्यवहार को ज्ञान का आधार और उसकी कसौटी माना था. फ्रांस के भौतिकवादियों ने इस विचारधारा को विकसित किया था. वैज्ञानिक भौतिकवाद ने हेगल की द्वंद्वात्मक पद्धति और फ्रांस के भौतिकवाद से बहुत कुछ लिया. किंतु उसने ज्ञान और व्यवहार का संबंध नए ढंग से जोड़ा. मार्क्स ने कहा कि दार्शनिक ने अभी तक तरह-तरह से संसार की व्याख्या ही की है; लेकिन मुख्य बात है, उसे बदलने की.
वैज्ञानिक भौतिकवाद का जन्म संसार को समझने और उसे बदलने के लिए, मानवजीवन को सुखी बनाने के लिए हुआ. इसका कारण यह था कि इतिहास में एक नई घटना घट चुकी थी. यह घटना थी मजदूर-वर्ग का जन्म। यह वर्ग अपने जन्म से ही संसार को बदलने के स्वप्न देखने लगा था. मार्क्स ने स्वप्न को साकार करने की वैज्ञानिक पद्धति निकाली. व्यवहार और परिवर्तन पर इस प्रकार बल देने का यह अर्थ नहीं है कि वैज्ञानिक भौतिकवाद चिंतन को, बौद्धिक क्रिया को नगण्य समझता है. नहीं, बुद्धि को व्यवहार-जगत से संबद्ध करके वह बौद्धिक क्रिया को सार्थक करता है.
-------------------------रामविलास शर्मा, आस्था और सौंदर्य से साभार
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