Sunday, April 8, 2012

माँ! मैं झूठ नहीं कहता

माँ! मैं झूठ नहीं कहता
मैं तुमसे प्यार नहीं करता
नहीं चाहता हूँ मैं तुम्हे
मैं तो अमेरिका को चाहता हूँ
माफ़ करना , ओ मेरी स्वर्ग सी बेहतर जन्मभूमि!

Thursday, October 8, 2009

पति,पत्नी और वो : एक अमानुषिक मनोरंजन

एन डी टी वि मनोरंजन पर एक रियलिटी शो शुरू हुआ है। इसमे कुछ पुरूष हैं , कुछ स्त्रियाँ हैं और कुछ शिशु हैं। इन शोहरतजादा और शोहरतजादियों को युगल यानि पति-पत्नी की भूमिका दी गई है। ये लोग टीवी और फिल्मों के पिटे मुहरें हैं। इन्हें बच्चे पालने का तजुर्बा नहीं है, मनोरंजन का पक्ष यह है कि ये दिए गए बच्चों को पालते हुए दिखकर ये दर्शकों का मनोरंजन करेंगे और उक्त चैनल का टी आर पी बढायेंगे।
आइये , अब थोडी सी चर्चा इस वास्तविक तमाशे से जुड़े लोगों की नियत को परखें।

Wednesday, July 15, 2009

भूख और बन्दूक

(प्रस्तुत हैं ग्वाटेमाला के प्रसिद्द कवि और छापामार विद्रोही ओत्तो रेनी कास्तिलो की कवितायेँ। अनुवाद कुलदीप प्रकाश का है। यहाँ अभिषेक मिश्रा के ब्लॉग शहर के पैगम्बरों से कह दो से साभार। )



तुम्हारे पास बन्दूक है
और मैं भूखा हूँ

तुम्हारे पास बन्दूक है
क्योंकि मैं भूखा हूँ

Friday, May 1, 2009

चुनाव आयोग को हमारी तरफ से


उस चुनाव आयोग को हमारी तरफ से जिसे होश नहीं कि किस ऊँगली पर निशान लगा रहा है? और जिसे दिखाने की प्रक्रिया में अर्थ का अनर्थ हो जाता है। ऐसी लापरवाही अशोभनीय है।

Friday, March 13, 2009

परिवार की बदलती संरचना

आज के समय में परिवार की संकल्पना मानसिक धरातल पर संभवत: यथावत् हो परन्तु उसकी संरचना विकृत एवं विघटित होती जा रही है। संबंधों में क्लेश बढ़ रहा है तो आचरणों में अह्म भाव। "मेरी मर्जी" से बनी मूल्य व्यवस्था मानवीय व्यवहार का हनन कर रही है। जीवन की गतिविधियाँ कर्तव्यों से नहीं अधिकारों से निर्धारित होने लगी है। तलाक, आत्महत्या एवं अपराध में वृद्धि अनायास ही नहीं हो रही है। पारिवारिक संबंधों में अपराध के स्वरूप भी बदलते एवं बढ़ते जा रहे हैं। आर्थिक अपराध व बुजुर्गों के मानसिक उत्पीड़न के अतिरिक्त यौनशोषण भी बढ़ता जा रहा है। बाज़ार के संस्कृति उद्योग ने इसे अधिक उग्र बना दिया है। इन विषयों पर साहित्यिक रचनाएँ बहुत हुईं, फिल्म व धारावाहिक भी बहुत बने, परन्तु समाज पर प्रभाव लगभग शून्य ही रहा। अपितु वृद्धि ही होती जा रही है। अतएव अन्य विभिन्न कारणों के अतिरिक्त बाज़ारतंत्र के सापेक्ष परिवार की बदलती संरचना पर पुनर्विचार की जरूरत है।

Thursday, March 5, 2009

अंग्रेजी भाषा का रोग

हमें यह लिखते हुए दु:ख होता है कि हमारे राष्ट्रीय कार्यकर्ता भी इस रोग में उतने ही ग्रस्त हैं, जितने सरकार के कर्मचारी या वकील या कालेजों के अध्यापक। इसमें संदेह नहीं कि वे खद्दर पहनने लगे हैं, पर उनके मनोभावों में लेशमात्र भी संस्कृति नहीं आयी। किसी कमेटी की बैठक में चले जाइए, आप खद्दरधारी महाशयों को फर्राटे से अंग्रेजी झाडते हुए पायेंगे। वह शब्द और वाक्य जो उन्होंने दैनिक पत्रों या अंग्रेजी पत्रों में पढ़े हैं, बाहर निकलने के लिए अकुलाते रहते हैं और अवसर पाते ही फूट निकलते हैं। हँसी तो तब आती है जब यह हज़रत अंग्रेजी न जाननेवाली महिलाओं के सामने भी अपने वाग्विलास से बाज़ नहीं आते। अंग्रेजी भाषा का यह जादू कब तक हमारे सिरों पर रहेगा? कब तक हम अंग्रेजों के गुलाम बने रहेंगे. इससे तो यही टपकता है कि राष्ट्रीयता अभी हृदय की गहराई तक नहीं पहुँचने पायी। महात्मा गाँधी के सिवाय हम किसी नेता को हिन्दी भाषा के प्रचार पर जोर देते नहीं देखते। यह विदित रहे कि जब तक हमारी राष्ट्रभाषा का निर्माण न होगा, भारतीय राष्ट्र का निर्माण ख्वाब और खयाल है। जापानी, जापानी में अपने भावों को प्रकट करता है, चीनी, चीनी भाषा में. ईरानी, फारसी में, लेकिन भारत की शिक्षित जनता अंग्रेजी पढ़ने और बोलने में अपना गौरव समझती है। कितने ही सज्जन तो यह कहने में संकोच नहीं करते कि हिन्दी लिखने या बोलने में उन्हें असुविधा होती है। यह सीधी-सादी मानसिक दासता है। बड़े से बड़ा हिन्दुस्तानी भी एक गोरे से बात करता है तो अंग्रेजी में। वह यह भूलकर भी नहीं सोचता कि अंग्रेज हिन्दुस्तानी में क्यों न बात करे। खैर अंग्रेजों से अंग्रेजी में बात करने को किसी हद तक क्षम्य भी मान लिया जा सकता है, लेकिन आपस में अंग्रेजी में बातचीत करने के लिए तो कोई दलील ही नहीं।
.............................................................................….प्रेमचंद

Saturday, January 17, 2009

sixth pay for university teachers

it is known to us that in the sixth pay,basic pay is fixed based on the pay grade.The rules says that if the pay grade is 5400 the basic pay is 15600,if the pay grade is 6600 the basic pay is fixed at 18750,and if pay grade is 7600 then basic pay is fixed at 21900,if pay grade is 8700 then basic is fixed at 37300 and so on.Now the acadamic pay grades are 6000,7000,8000,9000,which is clearly not in the rules of the sixth pay commission rules as notified by the govt of India.As per the definition of pay grade in the sixth pay commission,if the pay grade is 6000 the basic pay should be fixed at Rs 17175.For the pay grade 7000, the basic pay should be at Rs 19970,and for pay grade 8000 the basic pay should be fixed at rs 27190.Now the total bsic pays at the pay grades of 6000,7000,8000 should be 23175,26970,35190 respectively.the main argument is if our pay grade is 6000,how can our basic pay will be fixed at 15600 rather it should be at 17175 and so on.since our pay grade is not defined in the definition of sixth pay of the govt of india.So some mathematical modeling should be applied.Let x denotes the pay grade and y denotes the basic pay to be fixed.by using the well known pay grades x=5400,6600,7600,8700 etc and basic pays y=15600,18750,21900,37300 etc.Using the principle of the least square,we can fit an appropriate curve in the x-y plane.one of the simpliest method is fixing them linearly piece wise.i.e. join pts (5400,15600) and (6600,18750);join pts (6600,18750) and (7600,21900) lastly join pts (7600,21900) and (8700,37300).From this graph if x=6000,7000,8000 then y=17175,19970,27190 respectively.Thus the total basic pays should be 23175,26970,35190 for the pay grades of 6000,7000,8000 respectively.We should keep in mind that in the sixth pay commission pay grades determine the position of the post.

Wednesday, August 13, 2008

होरी और उन्नीस सौ चौरासी (व्यंग्य)

1984 का दिसंबर। 1934-35 के दिन होते तो प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ का नायक होरी इस वक्त अपने गाँव सेमरी में टूटे छप्पर के नीचे बैठा हुआ इधर-उधर से बीनकर लाई हुई लकड़ी और ईख की सूखी पत्तियों का अलाव ताप रहा होता। पर 1984-खासतौर से जार्ज आर्वेल के 1984-में होरी कुछ और ही हो गया है। वह अब हुक्का नहीं, बीड़ी पी रहा है। कछार में चोरी से चुआया हुआ महुए का ठर्रा भी वाजिब खुराक में पी चुका है। वह पंडित मातादीन की पक्की चौपाल में, पूस की रात के इस पहले पहर में टी.वी. देख रहा है और ‘प्रोलफीड’ खा रहा है।

‘पंडित’ मातादीन ? ‘गोदान’ के पाठक शायद चौंके। यह वही मातादीन है न जिसके पिता पंडित दातादीन थे, जिसने सिलिया नाम की चमारिन से प्यार किया था, जिसके प्यार का फल रामू था, जिसने बाद में सिलिया को अपनाते हुए कहा था, ‘‘मैं ब्राह्मण नहीं चमार ही रहना चाहता हूँ !’’ वह फिर से पंडित कैसे ? इसकी चर्चा बाद में होगी, पहले होरी और उसका ‘प्रोलफीड’।

‘प्रोलफीड’-बकौल जार्ज आर्वेल-प्रोलेतेरियत की खुराक, पार्टी की ओर से जनता को बराबर मिलनेवाला कूडा, मनोरंजन और फर्जी खबरों का मसाला। दूरदर्शन ‘प्रोलफीड’ उगल रहा है:

पिछले पाँच वर्षों में भारत की औसत सालाना विकास-दर 4.9% रही है, जबकि अमरीका की 1.2% और इंग्लैड की सिर्फ 0.3% । 1979-80 में कोयले का उत्पादन 10 करोड़ 40 लाख टन था। आज 1983-84 में यह बढ़कर 13 करोड़ 80 लाख टन हो गया है। पेट्रोल का उत्पादन उसी दौरान 1 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 2 करोड़ 60 लाख टन हो गया।...
होरी सुन रहा है, पर उसके लिए यह ऐसा संगीत है जिसके स्वरों का उतार-चढ़ाव तो समझ में आता है, शब्द पकड़ में नहीं आते। उसे कोयला और पेट्रोल से क्या लेना-देना ?

...जहाँ 1950-51 में सिर्फ 5 करोड़ टन अनाज पैदा हुआ था, अब 1984 में 15 करोड़ टन पैदा हुआ है..।
हुआ होगा, कहीं गोदामों में सड़ रहा होगा, चूहे खा रहे होंगे। उसे तो यह अनाज ‘काम के बदले अनाज’ के एवज में दाना-दाना गिनकर ही मिल रहा है, चार दिन भी बुखार आ जाए तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
....राष्ट्रीयकृत बैकों की 24000 शाखाओं के जरिए 1983-84 में देहाती क्षेत्रों में 4500 करोड़ रुपये की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई...।

जिसमें से दो-तिहाई ग्रामसेवकों, विकास-अधिकारियों, शाखा-प्रबंधकों की जेब में गई, जिससे उन्होंने ट्रक खरीदे और शहरों में कोठियाँ बनवाई, बाकी ऋण होरी जैसे अभागों को ऋणी बनाने के काम आया।

प्रोलफीड के शुरुआती आकड़े होरी के खयालों की बहती धारा में पतझर के पत्तों जैसे टपककर बह रहे थे। पर ऋण के ये आँकड़े उसकी चेतना पर दहकते हुए कोयलों-जैसे गिरे।

होरी के समुदाय ने रुपए और सूदखोरी की मार पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेली है। ‘गोदान’ के दिनोंवाली वह साहूकारी। पंडित दातादीन, दुलारी सहुआइन झिंगुरींसिंह, पटेश्वरी मंगरू साह। पचास रुपए के कर्ज पर मंगरू साह ने तीन सौ रुपए निकाले थे, ईख नीलाम करवाई थी। मीठी जबान के बावजूद दुलारी सहुआइन नाक रगड़ाकर ही दो सौ रुपए देने को तैयार हुई थीं, आने पर ब्याज लेनेवाले पंडित दातादीन ने नौ साल में तीस रुपए पर दो सौ माँगे थे। उन्हीं की कृपा थी कि होरी की खेती-बारी टूट गई, ईख नहीं बो सका और किसान से मजदूर की श्रेणी में आ गया। तब एक-एक रुपए के पीछे जैसी घुटन, जैसा अपमान झेलना पड़ता था, उसकी याद आते ही आज भी दिल को एक झटका लगता है।

और, आज बकौल ‘प्रोलफीड’ 1983-84 में राष्ट्रीयकृत बैकों से 4500 करोड़ रुपए की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई। होरी सार्वजनिक और स्वगत ढंग से कहता है: मार डाला बेईमानों ने।

1935 के होरी को साहूकारी सभ्यता के पेंच समझ में नहीं आए थे, सिर्फ इतना मालूम था-‘हम जाल में फँसे हैं। जितना ही फड़फड़ाओगे, उतना ही और जकड़ते जाओगे।’ एक तो सबकुछ भाग्य के अधीन था, दूसरे साहूकार भी तरह-तरह के थे। ‘‘ठाकुर या बनिए के रुपए होते तो ज्यादा चिंता न होती, पर ब्राह्मण के रुपए ! उसकी एक पाई भी दब गई तो हड्डी तोड़कर निकलेगी ! भगवान् न करे ब्राह्मण का कोप किसी पर गिरे !’’ तभी, जब गोबर ने दातादीन की सूदखोरी को चुनौती देकर तीस रुपए के कर्ज पर दो सौ की माँग के खिलाफ ब्याज समेत छाछठ रुपए लौटाने चाहे तो होरी ने साहूकार पंडित के चरण पकड़ लिए थे, कहा था, ‘‘महाराज, लड़कों की बातों पर मत जाओ। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हारी एक-एक पाई चुकाऊँगा।’’ उस साहूकारी तंत्र में बड़े रहस्य थे: सूद का कभी न समझ में आनेवाला हिसाब, बामन के कर्ज का डर, थाना-कचहरी की दौड़, खड़ी फसल की नीलामी, वसूली के तरीकों में गालियों और डंडे का प्रयोग, और सबसे बड़ी बात कि जितना ही फ़ड़फड़ाओगे उतना ही जकड़ते जाओगे।

1984 में बहुत कुछ बदला है पर सूदखोरी नहीं बदली। होरी के सिर पर अब दो तरह के कर्जें है। एक खेतिहर ऋण जो सिंचाई के साधन से लेकर खेती के औजारों, मशीनों, खाद, बीज आदि तक के लिए मिलता है, और दूसरा असली ऋण-बिरादरी में बेइज्जती से बचने के लिए लिया जानेवाला ऋण। पहले ऋण को सरकारी अर्थशास्त्री विकासपरक ऋण कहते हैं, दूसरे को सामाजिक दायित्वों वाला ऋण। चूँकि होरी को अर्थशास्त्र की नहीं, पुराणपंथियों की ही भाषा समझ में आती है, इसलिए पहले को देवऋण कहा जा सकता है, जो देवताओं की योनि में उपजे वित्त मंत्रालय के अधिकारियों, बड़े-बड़े बैंकरों, अर्थशास्त्रियों, ऋण-वितरण-सामारोहों की अध्यक्षता करनेवाले खादीपोश बहुरूपियों और चपरकनाती अफसरों की कृपा से प्राप्त होता है। दूसरा ऋण, उसी पुराणपंथी भाषा में पितृ-ऋण है जो पिता की कृपा से किसी जाति-विशेष में उत्पन्न होने के कारण मुंडन, छेदन, ब्याह, गौना, दसवाँ, तेरहीं आदि रस्मों को निपटाने के लिए फिर उन्हीं दुलारी सहुआइनों, उन्हीं दातादीनों, उन्हीं मंगरू साहुओं से लेना पड़ता है जो अब पहले से भी ज्यादा चतुर हैं, जिनके लड़के अब आई. ए. एस. में घुसकर या बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री लेकर उसी तबके में घुस रहे हैं जो देव-ऋण बाँटनेवालों का है। ‘उन्नीस सौ चौरासी’ का लेखक जार्ज आर्वेल इसे अपनी ‘न्यूस्पोक’ में ‘देपिसह’ कह सकता था-देव-पितृ-सहायता। ऋण अब रहा ही नहीं, जो भी ऋण देता है वह वास्तव में सहायता दे रहा है। और चूँकि देव-ऋण और पितृ-ऋण देनेवाले-दोनों ही किस्म के लोग एक ही वर्ग और एक ही पार्टी के हैं, इसलिए होरी को इन ऋणों से अलग-अलग तंत्र में भले ही फर्क मालूम पड़े, ऋण देनेवाले जानते हैं कि वे एक ही बिरादरी के हैं। इस तरह, दो कामों के लिए दो तरह का ऋण दो अलग-अलग रास्तों से आने के बावजूद चाहे सहकारी या सरकारी बैंक हो या पुश्तैनी सूदखोर, वसूली के मामले में दोनों एक-से घातक हैं, दोनों ही खेत कुर्क करा सकते हैं, दोनों ही हवालात भिजवा सकते हैं। यह सूदखोरी व्यवस्था का द्वित्व (डाइकॉटमी) नहीं है, सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के दुर्दांत सूदखोरों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है। संक्षेप में 1935 में होरी को जहाँ नदी के इस किनारे पर पड़े मगरमच्छ निगलने को झपटते थे, वहीं अब उसे दोनों किनारों पर अलग-अलग शक्लवाले, पर एक ही नस्ल के मगरमच्छों का सामना करना पड़ता है। होरी की यह अजीब नियति है कि वह इस नदी को छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता।

प्रोलफीड में 4500 करोड़ रुपए के खेतिहर ऋण का हवाला होरी के गले में हड्डी की तरह अटक जाता है। इस खेतिहर ऋण ने उसके साथ जो किया है, वैसा पंडित दातादीन और सेमरी के सारे साहूकार मिलकर भी नहीं कर सकते थे। उनके सामने कम से कम घिघियाया जा सकता था, कोई दुलारी सहुआइन कुछ देर के लिए द्रवित भी हो सकती थी, पर इसके सामने कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कानूनबद्ध चेहरारहित साहूकार कभी उसके सामने आता ही नहीं है, उसके अस्तित्व का पता कुछ सरकारी कारकुनों और अखबार में छपनेवाली कुर्की के इश्तहारों से ही चलता है।

इस साहूकारी व्यवस्था के शिखर पर बैठे हुए जो परम उत्साही व्यवसाय-विशेषज्ञ शहरी बाबू हैं, जो इस देश की राजनीतिक संध्या के निर्जन सुनसान में अचानक भारत-भाग्य-विधाता बन गए हैं, वोट पकड़ने के तंत्र में कर्ज की राजनीति को खूब समझते हैं। पर वे यह नहीं समझते कि गरीबी सबसे पहले इन्सान की पहल करने की शक्ति को नष्ट करती है। सर्वहारा का मकरुज होना, वह अच्छी नस्ल की भैंस के कारण हो या बिरादरी के भोज के लिए, कोढ़ में सिर्फ खाज का काम करता है।

झिंगुरीसिंह के लिए अपनी उम्दा जोत के लिए, जो चकबंदी के कारकुनों के कारण और भी उम्दा हो गई है, ट्यूबवेल के लिए कर्ज लेना दीगर बात है। वह समृद्ध को समृद्धतर बनाता है। वह कर्ज वापस न कर सकें, तब भी अपनी समृद्धि और राजनीतिक पुर्जेबाजी के सहारे वह अपनी जोत बचा ले जाएगा। पर ठर्रे में गनगनाते दिमाग के साथ प्रोलफीड खाते हुए इस होरी के साथ 1984 में क्या हुआ।

कुछ साल पहले उसे, जैसे सुअर के बच्चे को चार आदमी दबाकर उसका गला रेतते हैं, एक नसबंदी शिविर में जाकर नसबंदी करानी पड़ी थी। उसकी एक नस काट दी गई, पर उसे ज्यादा दुख नहीं हुआ था। जबसे वह पैदा हुआ, एक-एक करके उसकी नसें ही काटी जा रही थीं। उसने इससे भी समझौता कर लिया। पर कुछ ही साल बाद नसबंदी-शिविरों की जगह खेतिहर-ऋण के शिविरों ने ले ली। अब विकास-खंड के कर्मचारी और तहसील का पूरा अमला गाँव पर गिद्धों की तरह उतर रहा था। सेमरी के पास के गाँव बिलारी में, जहाँ पहले वहाँ के जमींदार रायसाहब ‘गोदान’ के 1934 में रामलीला का जलसा कराते थे, उनके लड़के ने, जो विधायक भी थे और जिन्हें विधायक से मंत्री बनना था, साल भर पहले ऋण-वितरण शिविर लगवाया था, जिसका लक्ष्य खेतिहरों में बीस लाख रुपए का ऋण बाँटना था। दिल्ली का खादीपोश युवा नेता जो देश की अखंडता और एकता की लगातार बातें करता था और जिसकी बातें होरी की पहुँच से बाहर थी, पूरे चेहरे को मुस्कान का अगियाबेताल बनाकर लोगों को ऋण बांट रहा था। बैंक के हाकिम बरसाती मेंढ़कों की तरह उसके आसपास फुदक रहे ते। उसी जलसे में होरी पर भी कुछ हजार रुपयों का कर्ज लाद दिया गया था।

उसे भैंस की जरूरत नहीं थी। 1935 के होरी ने एक गाय खरीदी थी; उधार पर, वह किस्सा अभी तक लोगों को याद है। सबकुछ ठीक था पर उसके भाई ने डाह के मारे गाय को जहर दे दिया था। उसी झमेले में गाय का पुराना मालिक भोला उसके बैल खोल ले गया था। अब, 1984 में, होरी में कर्ज लेकर भैंस खरीदने की दम न थी। पर तहसीलवाले नहीं माने। कोई लंबा-चौड़ा हिसाब दिखाकर उन्होंने बताया कि भैंस के दूध से, बैंक का कर्ज चुकाते हुए भी, होरी को कई सौ रुपए महीने का मुनाफा होगा। पर यह होरी भाग्य के बारे में अब और भी चौकन्ना हो गया था। वह जानता था कि ऐसी खूबसूरत स्कीम को भीतर-ही-भीतर खाने के लिए कोई न कोई कीड़ा जरूर लगा होगा। वह कीड़ा ग्रामसेवक था जिसने कर्ज का एक हिस्सा कमीशन में कटवा लिया था, दूसरा पशु-चिकित्सक था जिसने एक बड़े मेले में अच्छी नस्ल की भैंसों की सामूहिक खरीद कराके उसे तीन थन वाली एक भैंस का पगहा पकड़ा दिया था।

भैंस बीमार हालत में आज भी होरी के दरवाजे पर है। 1935 में उसकी गाय को उसके भाई ने जहर दिया था। आज, 1984 में उसकी जिंदगी में इन ऋण-वितरण शिविरवालों ने इस भैंस के बहाने न जाने कितना जहर घोल दिया है, वसूली के लिए कुर्की आने ही वाली है।

यह देव-ऋण का हाल है। पितृ-ऋण के लिए यानी, सोना की शादी के लिए उसे रुपयों की जरूरत है; अब दहेज ठीक से न दिया जाए तो लड़की पर मिट्टी का तेल छिड़ककर उसे जला देते हैं। होरी को दहेज के लिए कर्ज चाहिए। पर इस काम के लिए राष्ट्रीयकृत बैंक, सहकारी बैंक, ग्रामीण बैंक-सब बेकार हैं। उधर आज गाँव में दु्लारी सहुआइन और मंगरू साह भी नहीं है। डकैतों के डर से वे शहर के एक घने मुहल्ले में-जो साहूकारों की पुश्तैनी बस्ती है-जा बसे हैं। इन साहूकारों के भव्य भवन बने हैं, वे टेलीफोन पर कारोबार करते हैं। खेतिहर-ऋण-वितरण-शिविरवाला खादीपोश नेता इनके यहाँ दावत खाने आता है। होरी की लड़की की शादी के लिए बैंक ऋण नहीं देगा, यह ऋण उसे इन्हीं सूदखोरों से मिलेगा और इनकी शर्तें मंगरू साह की शर्तों से भी ज्यादा भयावह है।

पंडित मातादीन को यह टी.वी. सेट, बहुत किफायती लागत पर, पार्टी के प्रचार के लिए मिला है। होरी और वैसे ही दस-पाँच होरियों को ‘प्रोलफीड’ के साथ छोड़कर वे मकान के अंदर चले गए हैं-उसी काम के लिए चोरी से चुराया हुआ महुए का ठर्रा पीने को। बाहर आकर यह देखकर कि टी.वी. पर कोई ऐसी गजल आ रही है, जिसमें गले लग जाने और बोसा लेने की इफारत है, वे सेट बंद कर देते हैं,। फिर लोगों को धर्मचारी जी का उपदेश, उनकी तांत्रिक सिद्धियों की महत्ता और उनके रचे भजनों का पाठ सुनाने लगते हैं।

पर वे तो चमार हो गए थे, फिर से पंडित कैसे हो गए ? ऐसे। सिलिया और उनका बेटा रामू पढ़ने में अच्छा निकला। उसने अपनी माँ की जाति को अपनी जाति बनाकर सुरक्षित जगहों में से आबकारी के इंस्पेक्टर की एक जगह ले ली। लड़के के इंस्पेक्टर बनते ही गाँववालों ने तय किया कि अब मातादीन को चमार नहीं कहा जा सकता, इसलिए उन्हें पंडितजी कहा जाने लगा। उनकी चुटिया अचानक बढ़ी ही नहीं, उठ भी गई, उनके शरीर पर तीन धागे फिर से वापस आ गए। जिस एक गाँव ने बेटे को चमार बनाकर इंस्पेक्टर बनाया, उसी ने बाप को फिर से ब्राह्मण बना दिया। अब मातादीन के यहाँ सरकारी अमलों की आमद-रफ्त बढ़ रही है। पार्टी की स्थानीय शाखा के वे अध्यक्ष नामजद हुए हैं।


ऐल्डास हक्सले के ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में यौनाचार एक अच्छा और अनिवार्य कर्त्तव्य है, जार्ज आर्वेल के ‘उन्नीस सौ चौरासी’ में यौनाचार एक घटिया, गर्हित काम है। आज होरी के 1984 में सिर्फ बलात्कार से प्राप्त यौन-संतोष ही चरम संतोष है। ‘गोदान’ के 1935 में सोना, रूपा, सिलिया, झुनिया गाँव में मुक्त पक्षियों की तरह रहती थीं। खुद जिनके लिए उनके मन में आकर्षण हो, उन्हें छोड़कर बाकी सबसे भाईचारे के संबंध थे। शहर में पढ़नेवाले झिंगुरीसिंह के लड़कों ने ही उन दिनों भविष्य का इशारा दिया था, जब उनके बारे में कहा गया था कि शहर में पढ़ने जाकर उन्होंने गाँव की बिरादरी का नेम-धरम भुला दिया है।

अब होरी को सिर्फ सरकारी कर्ज की ही चिंता नहीं है, घर में जवान लड़कियों का बोझ उसे दिन-रात कुचलता रहता है। वह जमाना नहीं रहा जब गाँव के किसी लड़के की बदचलनी पर पंचायत बैठती थी, हर्जाना भरना पड़ता था। अब वह लड़का पंचायत को गाली देकर शहर भाग सकता है, वहाँ रिक्शा चलाकर किसी भी खेतिहर मजदूर से ज्यादा कमा सकता है।

चारों ओर असुरक्षा है। शाम से ही घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सूरज डूबते ही सन्नाटा छा जाता है। कभी-कभी कुत्ते भौंकते हैं, जिससे अँधेरे का आतंक और गहराने लगता है। चारों ओर के जंगल और बाग-सरकारी वनमहोत्सवों के ढकोसलों के बावजूद कट गए हैं। अब गीदड़ और चमगादड़ तक नहीं बोलते। ‘पूस की रात’ जैसी कहानी में जाड़ा ही अब सबसे बड़ा यथार्थ बचा है। हिरनों और नीलगायों के झुंड अब फसल चरने नहीं आते। उनकी जगह गिरोहबंद डकैतों ने ले ली है। वे किसी भी गाँव से निकल सकते है। वे सिर्फ लूटपाट करने नहीं आते, जवान बेटियों और बहुओं के लिए भी आते हैं। वे उनकी काम-क्षुधा का सबसे बड़ा आहार हैं। बूढ़ें संपाती की तरह होरी उन्हें बचाने में असमर्थ है।

मातादीन समझाते हैं: लड़कियों को कुछ दिन के लिए शहर में गोबर के पास छोड़ आओ। शादी तय हो जाए, तब बुला लेना।

बड़ी-बड़ी तरक्कियाँ हुई हैं। पक्के मकान, बिजली, सड़के, स्कूल..पर होरी, उसके जैसे लाखों खेतिहर मजदूर और करोड़ों आदिवासी- इन सबके लिए 1984 आज भी जार्ज आर्वेल का दु:स्वप्न जैसा ही है। आजादी के बाद के आर्थिक उभार और राजनीति का फायदा बहुतों को मिला होगा, पर होरी जैसे खेतिहर मजदूर के लिए न कोई मिनिमम वेजेज़ ऐक्ट लागू होनेवाला है, न वर्कमेंस कंपेसेशन ऐक्ट। न बीमारी में उसकी व्यथा सुननेवाला कोई डाक्टर है न तमंचे की चोट से बचानेवाला कोई थानेदार। उसके बारे में सत्तापतियों की सिर्फ तीन चिंताएँ हैं: उसे बच्चा पैदा करने से कैसे रोका जाए भूदान में मिले एक बीघा ऊसर के लिए उसको ज्यादा-से-ज्यादा विकास-ऋण कैसे पकड़ा दिया जाए और भले ही डकैतों की गोली लगने पर उसे थाने पर रपट लिखाने के लिए चौदह किलोमीटर चलना पड़े, उसका वोट लेने के लिए पोलिंग स्टेशन उसके दरवाजे पर कैसे खड़ा कर दिया जाए। आतंक, असुरक्षा, कर्ज और दरिद्रता से जूझते हुए होरी को अब राहत के नाम पर महुए का अवैध ठर्रा-भर बचा है, जो जार्ज आर्वेल के 1984 में विस्टन स्मिथ को भी विक्टरी जिन के नाम से मिला था, और मिला है पंडित मातादीन के घर का टी.वी. सेट, जो विंस्टन स्मिथ के खुद अपने घर में लगा था। ऐल्डोस हक्सले ने शायद इसी की कल्पना करके आर्वेल को अपने एक पत्र में लिखा था:

‘‘अगली पीढ़ी आते-आते, मुझे लगता है, दुनिया के शासकगण यह जान जाएँगे कि लोगों पर शासन करने के लिए उनमें बालबुद्धि और मृदुता का उद्दीपन क्लबों और जेलों से ज्यादा कारगर साबित हो सकता है और ठोकर और कोड़े मारकर लोगों को काबू में लाने के बजाय प्रेमपूर्वक उनको अपनी दास-भावना में आसक्त बनाकर शक्ति की प्रबल आकांक्षा को मजे से संतुष्ट किया जा सकता है।’’

प्रोलफीड में सबकुछ गलत नहीं है। बेशक, फिल्म एक्टर, संगीतकार, प्रबंध-विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, अंतरिक्षयात्री, उद्योगपति, दार्शनिक, न्यायविद् हमारी जिंदगी को समृद्धतर बनाने में लगे हैं, पर होरी की बदकिस्मती कहिए, उस जिंदगी पर हुकूमत छुरेबाजों, दलालों, सूदखोरों बौद्धिक नपुंसकों, डकैतों, संवेदनहीन हाकिमों और राजनीतिक मौकापरस्तों की है।

________श्रीलाल शुक्ल, कुछ जमीन पर कुछ हवा में से अंश साभार

Sunday, August 10, 2008

कविता के कार्य

सभ्यता के विकास से मानव जीवन अनेक आवरणों से ढक और जकड़ जाता है. कविता इन आवरणों को भेदती है और भावों को उनके मूल या आदिम रूपों तक ले जाती है. उदाहरण के लिए :
किसी का कुटिल भाई उसे सम्पत्ति से एकदम वंचित रखने के लिए वकीलों की सलाह से एक नया दस्तावेज़ तैयार करता है. इसकी ख़बर पाकर वह क्रोध से नाच उठता है. प्रत्यक्ष व्यावहारिक दृष्टि से तो उसके क्रोध का विषय है वह दस्तावेज़ या कागज़ का टुकड़ा. पर उस कागज़ के टुकड़े के भीतर वह देखता है कि उसे और उसकी संतति को अन्न वस्त्र न मिलेगा. उसके क्रोध का प्रकृत विषय न तो वह कागज़ का टुकड़ा है और न उस पर लिखे हुए काले-काले अक्षर. ये तो सभ्यता के आवरण मात्र हैं. अत: उसके क्रोध में और कुत्ते के क्रोध में, जिसके सामने का भोजन कोई दूसरा कुत्ता छीन रहा है, काव्य दृष्टि से कोई भेद नहीं है.
इस प्रकार कविता सभ्यता के आवरणों को भेद कर भावों के आदिम रूपों को हमारे सामने लाती है.
कविता सृष्टि के व्यापक विस्तार के साथ भावों का विस्तार करती है. पशु की भावना संकीर्ण और केवल उसके तात्कालिक रूप तक सीमित होती है. किन्तु मनुष्य की भावना जीव जगत् ही नहीं, पदार्थों तक में फैली होती है. इस प्रकार कविता मनुष्य के संपर्क में आने वाली समस्त सृष्टि के साथ उसके भावों का संयोग करती है.
कविता को भावयोग कहा गया है. कविता मनुष्य की भावसत्ता के सर्वोत्त्म रूप का साक्षात्कार कराती है. वह मनुष्य को स्व-पर की संकीर्ण सीमा के ऊपर उठा देती है.
कविता का एक कार्य आनंद प्रदान करना भी है. लेकिन कविता के आनंद का मूल्य तभी है जब वह जीवन के किसी मार्मिक तथ्य का उद्घाटन भी करे.

.................प्रो. नित्यानंद तिवारी, साभार

Monday, August 4, 2008

हमारा भी हिस्सा होना चाहिए


बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जाएगा

लेकिन उसमें कुछ नमक भी है

जो बच रहेगा


टपक रहे ख़ून में जो पानी है वह सूख जाएगा

लेकिन उसमें कुछ लोहा भी है

जो बच रहेगा


एक दिन नमक और लोहे की कमी का शिकार

तुम पाओगे ख़ुद को और ढेर सारा

ख़रीद भी लाओगे

लेकिन तब पाओगे कि अरे

हमें तो अब पानी भी रास नहीं आता

तब याद आएगा वह पानी

जो तुम्हारे देखते-देखते नमक और लोहे का

साथ छोड़ गया था


दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है

तो फिर दुनिया भर में बहते हुए ख़ून और पसीने में

हमारा भी हिस्सा होना चाहिए.

--------------नरेश सक्सेना, समुद्र पर हो रही है बारिश, साभार

Friday, July 18, 2008

भारतीय संस्कृति और युवा वर्ग


संस्कृति अपनी भाषा में निबद्ध होती है. भाषिक परिवर्तन संस्कृति के स्वरूप को भी परिवर्तित करता है, और भाषा की मृत्यु संस्कृति को भी मारती है. भारतीय संस्कृति भारत की बहुभाषायी अस्मिता पर आधारित बहुआयामी संस्कृति की एकता की परिचायक है. ऐसे में भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी का वर्चस्व भारतीय संस्कृति में भी पश्चिम के वर्चस्व को स्थापित करता है. जिस तरह भाषिक अभिव्यक्ति मिक्स होती जा रही है, उसी तरह सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी. आज के युवाओं के पहनावे, साज-श्रृंगार, संवाद-विवाद का तरीका, सुख और सुविधाओं के आधारभूत तत्त्व और परम्परागत रीति-रिवाजों के प्रदर्शन का स्वरूप भारतीय संस्कृति की नव्यात्मकता को स्पष्ट कर देता है. ऐसे में अमिताभ बच्चन का यह कथन हास्यास्पद लगता है कि
आज हर बात पर सोचने और काम करने के तरीकों और दृष्टिकोण में बदलाव ज़रूर आ गया है. इस बदलाव को संस्कृति के बदलाव से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.
------------------------------ (आउटलुक -40, पृ0-23)

भारतीय संस्कृति एक रंगमहल है जिसमें अनगिनत दरवाजे हैं. जवाहरलाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था और मनमोहन सिंह के उदारवाद ने क्रमश: इन दरवाजों को खोल दिया. समय के साथ संस्कृति के रंग-रूप बदलते गए, जिसे किसी ने पापुलर कल्चर और मास कल्चर पुकारा तो किसी ने अपसंस्कृति कहा. समकालीन भूमंडलीकृत उद्योगों ने एक तरफ भारत के अर्थशास्त्र को बदल दिया है तो दूसरी तरफ सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को भी. संस्कृति का विराट उद्योग जगत अत्यंत उद्धत और विकसित है. जिसके माध्यम से उत्पादित संस्कृति को छुट्टा साँड भी कहा जाता है.
भारतीय युवाओं पर संस्कृति के इस वर्तमान स्वरूप का न केवल प्रभाव पड़ता है वरन् प्रभाव की रूपरेखा उद्योगों के स्वरूप को भी परिवर्तित कर देती है. यही कारण है कि भारतीय संस्कृति हिन्दुस्तान की जातीय पहचान न रहकर, निर्यातित अथवा आयातित माल का परम्परागत संस्कृति के साथ री-मिक्स आइटम हो जाती है. इस आइटम में जातिगत कट्टरता की शिथिलता, प्रेम की पाबंदियों का तिरस्कार सकारात्मक है तो अश्लील चाहतों, नंगई हरकतों के साथ स्वार्थ की प्रबलता भी विद्यमान है, जो मानवीय चेतना और मूल्यों को कमज़ोर करती जा रही है. ऐसा पूर्ववर्ती दौर में भी था, लेकिन इसके दायरे हुआ करते थे. आज दायरों को या तो अभाव है, अथवा दायरों के भी दायरे हैं. सांस्कृतिक बाज़ारतंत्र में नैतिक दायरों की सख्त ज़रूरत है.
फिल्में, टी.वी., सूचना, फैशन, पेज-थ्री, खेल, विज्ञापन, धार्मिक आचरण आदि क्षेत्रों के माध्यम से युवा वर्ग की जीवन-शैली और जीवन-मूल्य निर्धारित होता है, जिससे संस्कृति परिवर्तित, विकसित एवं पुनर्रचित हो पाती है. इसीलिए यह क्षेत्र बाज़ारतंत्र की गतिविधियों को तय करता है जो केवल लाभ के एकल उद्देश्य से गतिशील रहता है. फलत: संस्कृति, आदर्शतम मूल्यों से परे व्यक्तिगत-मूल्य-विधानों की नियंता बन जाती है. आज भारतीय युवक यह कहते ना के बराबर दिखते हैं कि मैं गरीबों का दिल, हूँ वतन की ज़ुबाँ. अक्सर यही कहते दिखते हैं कि मैं अमीरों से अमीर, होऊँ अमेरिकन इंसाँ. वह भी अंग्रेजी में.
स्पष्ट है कि समकालीन युवाओं पर व्यक्तिगत-मूल्य-विधानों का प्रभाव अधिक है, जिसे अर्जित करने की कोई निर्धारित अथवा नैतिकजन्य प्रविधि नहीं है. ऐसे में धूमिल की ये पंक्तियाँ प्रासंगिक लगती हैं कि
ज़िंदा रहने के पीछे यदि सही (मानवीय) तर्क नहीं है
तो रामनामी बेचकर या रंडियों की
दलाली करके रोजी कमाने में कोई फ़र्क नहीं है.

Monday, July 14, 2008

यथार्थ जगत और साहित्य


साहित्य और यथार्थ जगत के संबंध पर विचार करना इसलिए आवश्यक होता है कि यूरोप और अमरीका के अनेक साहित्यकार यथार्थ जगत के अस्तित्व या महत्त्व को अस्वीकार करके अपने मानस से साहित्य-सृष्टि करने का दावा करते हैं. इसके लिए वे भाववादी दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं का सहारा लेते हैं. इस सबका प्रभाव हिंदी साहित्य पर भी पड़ रहा है और अनेक हिंदी लेखक भारतेंदु से लेकर प्रेमचन्द तक के साहित्य-विकास को बढ़ाने के बदले उसे किसी न किसी रूप में अस्वीकार करते हैं और विदेश की उन भावधाराओं को ग्रहण करते हैं जिनमें लेखक के अहम् की तुलना में समग्र संसार नगण्य ठहरता है.


प्लैटो, बर्कले, हेगल – यूरोप के इन भाववादी दार्शनिकों का प्रभाव वहाँ समाप्त नहीं हो गया. समाप्त होना तो दूर, आधुनिक भौतिकशास्त्र (फिजिक्स) की प्रगति से कुछ वैज्ञानिकों ने भी यह परिणाम निकाला है कि बाह्य जगत का अस्तित्व नहीं है. हाइजेनवर्ग और प्लांक के अनुसंधानों ने विज्ञान में संदेहवाद या अज्ञेयवाद को प्रश्रय दिया. पहले पदार्थ और शक्ति (मैटर और एनर्जी) में अंतर माना जाता था. अब पता चला कि पदार्थ की गति लहरों के रूप में होती है.
प्रत्येक लहर (वेवलेंथ) का संबंध शक्ति (एनर्जी) के एक निश्चित माप से रहता है. शक्ति के इस माप को क्वांटम कहते हैं. यह क्वांटम केवल लहर की माप (वेवलेंथ) पर निर्भर रहता है. क्वांटम के बारे में धारणा यह है कि वह प्रति सेकेंड रेडिएशन के स्पंदनों के अनुपात में होता है.

संदेहवाद के उत्पन्न होने का कारण यह है कि प्रकृति में कण और लहर की पुरानी धाराओं के बदले हमें ऐसे पदार्थ के दर्शन होते हैं जो कण और लहर दोनों है. यदि कण की स्थिति का ही पता लगाना हो तो पुरानी पद्धति से पता लगा लिया जाए. किंतु जब वह कण लहर भी है, तब स्थिति का पता कैसे लगे?
साथ ही यथार्थ जगत में हस्तक्षेप किए बिना उसे जानना संभव नहीं होता और हस्तक्षेप करते ही उसकी यथार्थता दूषित हो जाती है. इस संबंध में मौरिस कौर्नफोर्थ आदि मार्क्सवादी विचारकों का कहना है कि पुरानी नाप-जोख की पद्धति से यह कठिनाई उत्पन्न होती है. इससे परिणाम यह नहीं निकलता कि हम यथार्थ जगत को जान नहीं सकते वरन यह निकलता है कि उसे जानने की पुरानी पद्धति बदलना आवश्यक है. (देखिए मार्क्सिस्ट क्वार्टरली, जुलाई, 1954 में आर्थर सडैबी और मौरिस कौर्नफोर्थ का लेख ‘क्वांटम भौतिकशास्त्र की दार्शनिक समस्याएँ’.)

बर्ट्रेंड रसेल जैसे दार्शनिक दर्शनशास्त्र का मुख्य कार्य तार्किक विश्लेषण समझते हैं. उनके लिए सारे भ्रमों की जड़ भाषा का असंगत प्रयोग है. इस भ्रम को दूर करने का परिणाम यह होता है कि संसार ही भ्रम सिद्ध हो जाता है. विशुद्ध चेतना का अनुसंधान करनेवाले अनेक दार्शनिक बाह्य जगत के अस्तित्व से इनकार करते हैं.

लोग बात करते हैं अस्तित्ववाद की लेकिन इनकार करते हैं वाह्य जगत के अस्तित्व से. अस्तित्ववाद को प्रभावित करनेवाले किर्कगार्ड का कहना था, ‘सत्य केवल आत्मगत होता है’ (Truth is subjectivity)। इस प्रकार वस्तुगत सत्य को अस्वीकार कर दिया गया. फिलिप मैरे जैसे अस्तित्ववादी नीत्शे को भी अस्तित्ववादी मानते हैं. ‘‘नीत्शे किर्कगार्ड के बारे में कुछ न जानता था किंतु व्यक्ति की चिंता, निर्णय और भावना बल देने के कारण वह अस्तित्ववादी था.’’ नीत्शे के इस अस्तित्ववादी ने जर्मनी में युद्धकामी शक्तियों को प्रोत्साहन दिया जिससे दो बार विश्व-युद्ध हुआ. विश्व-युद्ध के मूल कारण आर्थिक और राजनीतिक थे. इन कारणों का ही एक परिणाम नीत्शे का व्यक्तिवाद था जिसने युद्ध-प्रचार में सहायता दी.
बीसवीं सदी में पूँजीवाद का विकृत दर्शन व्यक्तिवाद पर निर्भर है. साधारणत: वह मानवप्रगति का विरोध करता है; विशेष परिस्थितियों में वह युद्ध-प्रचार में सहायक भी हो जाता है.

कैथलिक और नास्तिक, दोनों प्रकार के अस्तित्ववादियों का सामान्य गुण बतलाते हुए सार्त्र ने लिखा है, ‘‘उनका विश्वास है कि तत्त्व पहले अस्तित्व है; दूसरे शब्दों में हमें शुरूआत आत्मगत पक्ष से करनी चाहिए.’’ यह आत्मगत पक्ष क्या है ? ‘‘प्रत्येक मनुष्य एक सार्वजनीन धारणा, मानव-संबंधी धारणा का विशेष उहाहरण है.’’ इससे यह न समझना चाहिए कि विशेष मानव की तुलना में सामान्य मानवता महत्त्वपूर्ण है. आशावादी विचारकों से भी अपनी भिन्नता विज्ञापित करते हुए सार्त्र ने लिखा है, ‘‘सत्य इसके सिवा और कुछ नहीं है कि मैं सोचता हूँ, इसलिए हूँ. यह उस चेतना का निरपेक्ष सत्य है जो अपने को प्राप्त करती है. अपने को प्राप्त करने के इस क्षण के बाहर मनुष्य के संबंध में जो भी सिद्धांत प्रतिपादित किया जाता है, वह सत्य का हनन करता है.’’ सार्त्र के अनुसार यह सिद्धांत मानव- गौरव के अनुकूल है क्योंकि इससे मनुष्य पदार्थ नहीं बन जाता. ‘‘सभी तरह के भौतिकवाद विचारक को बाध्य करते हैं कि वह सभी मनुष्यों को-अपने को भी-पदार्थ समझे अर्थात उसे पूर्वनिश्चित प्रतिक्रियाओं का परिणाम समझे जो मेज, कुर्सी या पत्थर के गुणसमूहों और संघटनों से भिन्न नहीं है.’’ नैतिक क्षेत्र में अच्छे-बुरे का निर्णय भी व्यक्ति ही करता है; जिस समाज का वह सदस्य है, उसे कुछ कहने का अधिकार नहीं है. ‘‘यदि मैं किसी काम को अच्छा समझता हूँ तो वह मैं ही हूँ जो उसके अच्छे-बुरे होने का निर्णय करता हूँ.’’ इस प्रकार मनुष्य परम असामाजिक प्राणी ठहरता है. साहित्य में साधारणीकरण की गुंजाइश ही नहीं रहती. सार्त्र की इस व्यक्तिवादी विचारधारा का असर अज्ञेय, धर्मवीर भारती प्रभृति आत्मोपलब्धि में तल्लीन निरपेक्ष व्यक्तिवाले सज्जनों पर देखा जा सकता है.

सार्त्र ने अपनी विचारधारा को सभी तरह भौतिकवाद से भिन्न ठीक ही बतलाया है. अस्तित्ववाद पुराने भाववाद- चेतना को सत्य और संसार को मिथ्या समझनेवाली विचारधारा-का ही एक रूप है. भाववाद के अनेक रूप अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते हैं वैज्ञानिक भौतिकवाद को। भाववादियों के अनुसार वैज्ञानिक भौतिकवाद में आस्था रखनेवाले लोग मनुष्य में आस्था खो देते हैं. आस्था का प्रश्न हल करना है तो समाज निरपेक्ष अहम् में विश्वास करो. कला और साहित्य को उसी का विस्फोट मानो. कुछ अन्य मित्र जो संसार को मिथ्या नहीं कहते, वैज्ञानिक भौतिकवाद को दर्शन ही नहीं मानते. उनकी समझ में वैज्ञानिक भौतिकवाद जगत के स्वरूप की व्याख्या नहीं करता, न वह ज्ञान की समस्या हल करता है. प्रतीति में भी तो होता है; फिर कैसे जानें, कौन-सी प्रतीति भ्रम है और कौन-सी वास्तविक ज्ञान? वैज्ञानिक भौतिकवाद व्यवहार पर बल देता है. इसे कुछ विद्वान शुद्ध चेतना का अपमान समझते हैं. ज्ञान का साक्ष्य चेतना के अंदर ही होना चाहिए; बाहर हुआ तो फिर दार्शनिकता कहाँ रही.

वैज्ञानिक भौतिकववाद के अनुसार मनुष्य प्रकृति की उपज है और विचार चेतना मानव-मस्तिष्क की उपज। मस्तिष्कहीन विचार और चेतना का अस्तित्व केवल कल्पना की वस्तु है. भौतिकता से परे चेतना का निवास नहीं है. जिस पदार्थ का गुण चेतना है, उसमें विद्युत-प्रहारों द्वारा हस्तक्षेप करके चेतना के अनेक अंगों को नष्ट किया जा सकता है. सर में चोट लगने से स्मृति का नष्ट होना साधारण अनुभव-क्षेत्र की बात है.

चेतना मस्तिष्क में निहित पदार्थ का गुण है, प्रकृति के एक अंश का गुण है, इसलिए वास्तविक विचार केवल चिंतन द्वारा अपने भीतर से उत्पन्न नहीं किए जा सकते. सही विचार के लिए मानव-चेतना और बाह्य जगत का सम्पर्क आवश्यक होता है. इस कारण ज्ञान का आधार मनुष्य का प्रत्यक्ष अनुभव है. अपने व्यवहार से ही मनुष्य अपना ज्ञान समृद्ध करता है. ज्ञान से वह व्यवहार-क्षेत्र में आगे बढ़ता है. इस आगे बढ़ने के नए अनुभव से वह अपने ज्ञान को फिर से समृद्ध करता है. इस प्रकार व्यवहार-क्षेत्र के विकास के कारण मनुष्य का ज्ञान नित विकसित होता रहता है. वैज्ञानिक भौतिकवादी के लिए व्यवहार-क्षेत्र से संन्यास केवल आत्मचिंतन से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती. ‘‘जो लोग समझते है कि आँख मूँदकर ध्यान या समाधि लगाने से भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल की बातें सूझने लगती हैं उन्हें इस पर ध्यान देना चाहिए.’’ ये शब्द रामचन्द्र शुक्ल ने ‘विश्व-प्रपंच’ की एक पाद-टिप्पणी में लिखे थे. जिन मूल वाक्यों पर उन्होंने टिप्पणी लिखी थी वे ये हैं, ‘‘अत: बिना इस प्रकार के बाह्य निरीक्षण के केवल आत्म-निरीक्षण-द्वारा निश्चित मनो व्यापार संबंधिनी बातें बाह्य पक्की नहीं समझी जा सकतीं. पर वाह्य निरीक्षण की पूर्णता के लिए शरीर-विज्ञान, अंगविच्छेद शास्त्र, शरीराणु-विज्ञान, गर्भ विज्ञान और जीव-विज्ञान इत्यादि का यथावत ज्ञान होना चाहिए.’’

बाह्य निरीक्षण आवश्यक है. केवल आत्म-निरीक्षण द्वारा मनोव्यापार-संबंधी –अर्थात चेतना संबंधी बातें पक्की नहीं समझी जा सकतीं. आँख मूँदकर ध्यान लगाने और भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञान का दावा करनेवालों के हाथ आत्म-प्रवंचना ही लगती है.

वैज्ञानिक भौतिकवाद व्यवहार, अनुभव और प्रयोग से परे इलहाम द्वारा ज्ञान-प्राप्ति का दावा नहीं कर सकता. जो दार्शनिक व्यवहार से दूर रहकर विशुद्ध चिंतन से पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं या ऐसा ज्ञान प्राप्त करने का दावा करते हैं, वे अवश्य या तो स्वयं पैगंबर होंगे या किसा पैगंबर के सहारे उन्हें यह गुप्त ज्ञान प्राप्त हुआ होगा. उनके ज्ञान में उन्हीं को आस्था हो सकती है जो श्रद्धालु भक्त हैं; इलहाम की बातों को यह संदेह से देखनेवाले, व्यवहार द्वारा ज्ञान-अज्ञान का भेद करनेवाले वैज्ञानिकों को उस पर विश्वास नहीं हो सकता. भाववादी दर्शन ज्ञान की पूर्ण व्यवस्था देने का दावा करते हैं. भौतिकवादी दर्शन पूर्ण होने का दावा नहीं कर सकता क्योंकि वह ज्ञान को विकासमान समझता है. विश्व क्या है, पदार्थ का मूल रूप क्या है, जीव-अजीव का संबंध कैसा है, इन प्रश्नों के बारे में भौतिकवादी दर्शन विज्ञान से ऊपर उठकर, शुद्ध चिंतन के बल पर, निर्णयात्मक उत्तर नहीं देता. विश्व के प्रति उनका दृष्टिकोण, उसके तर्क और चिंतन की पद्धति वैज्ञानिक अनुभवों पर निर्भर है और इसलिए वह वैज्ञानिक प्रगति में सहायक होती है.

इंगलैंड के बेकन और लॉक जैसे चिंतकों ने अनुभव और व्यवहार को ज्ञान का आधार और उसकी कसौटी माना था. फ्रांस के भौतिकवादियों ने इस विचारधारा को विकसित किया था. वैज्ञानिक भौतिकवाद ने हेगल की द्वंद्वात्मक पद्धति और फ्रांस के भौतिकवाद से बहुत कुछ लिया. किंतु उसने ज्ञान और व्यवहार का संबंध नए ढंग से जोड़ा. मार्क्स ने कहा कि दार्शनिक ने अभी तक तरह-तरह से संसार की व्याख्या ही की है; लेकिन मुख्य बात है, उसे बदलने की.
वैज्ञानिक भौतिकवाद का जन्म संसार को समझने और उसे बदलने के लिए, मानवजीवन को सुखी बनाने के लिए हुआ. इसका कारण यह था कि इतिहास में एक नई घटना घट चुकी थी. यह घटना थी मजदूर-वर्ग का जन्म। यह वर्ग अपने जन्म से ही संसार को बदलने के स्वप्न देखने लगा था. मार्क्स ने स्वप्न को साकार करने की वैज्ञानिक पद्धति निकाली. व्यवहार और परिवर्तन पर इस प्रकार बल देने का यह अर्थ नहीं है कि वैज्ञानिक भौतिकवाद चिंतन को, बौद्धिक क्रिया को नगण्य समझता है. नहीं, बुद्धि को व्यवहार-जगत से संबद्ध करके वह बौद्धिक क्रिया को सार्थक करता है.


-------------------------रामविलास शर्मा, आस्था और सौंदर्य से साभार

मानो या ना मानो

बताऊँ !
कैसे लगते हैं
दरिद्र देश के धनिक
कोढ़ि कुढब तन पर मणिमय आभूषण.


________________________ नागार्जुन

Wednesday, June 25, 2008

स्त्री की अस्मिता






आजकल सारी दुनिया में ‘नारीवाद’ शब्द लोगों को चौंका रहा है. औरतों की आजादी के आंदोलन को नाना प्रकार की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ रहा है. चिली, नामीबिया, पेरू, बांग्लादेश, केन्या, रूस, पूर्वी यूरोप के देशों, कैथोलिक चर्च और हिंदू परंपरावादियों की नजर में नारीवाद अनैतिक आचरण का पर्याय है. जमीन से जुड़े आंदोलनकर्ताओं के अनुसार, विशेषकर पूर्वी यूरोप के वामपंथियों के अनुसार नारीवाद मात्र एक बुर्जुआ विचार है. हालत यह है कि स्त्री अधिकारों की प्रबलतम समर्थकों के एक हिस्से ने भी नारीवाद को खारिज कर दिया है. मगर ऐसा क्यों हो रहा है? इस सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार करते हुए उसे विभिन्न विचारधाराओं और राष्ट्रीय आंदोलनों की रोशनी में रखकर देखना होगा.

कई स्त्रियों के अनुसार नारीवादी विचारधारा का स्रोत्र पश्चिम रहा है. अर्थात भारतीय संदर्भ में यह एक आयातित विचारधारा है और इस विचारधारा की पैरोकार श्वेत पश्चिमी मध्यवर्गीय स्त्रियाँ हैं. समझा जाता है कि इन श्वेतांग स्त्रियों की जीवन-शैली, परंपरा एवं मूल्यबोध से तीसरी दुनिया की औरतों को क्या लेना-देना! इस दुनिया के तो पुरुष ही स्वतंत्र नहीं हैं, तब भला औरत क्या मुक्त होगी? समस्या यह है कि एक तरफ तो नारीवाद अपने पश्चिमी मूल के कारण विवादग्रस्त हुआ है और दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वतंत्रता और पहचान की उसकी विचारधारा, रणनीति और परियोजना विशिष्ट किस्म की है. इस विशिष्टता के कारण भ्रम यह होता है कि मुक्तिकामी मानवाधिकार के लिए किए जानेवाले अन्य आंदोलनों से नारियाँ नहीं जुड़ पायी हैं. इसी सिलसिले में यह भी मान लिया जाता है कि नारीवाद अराजक मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है, सामाजिक व्यवस्था की चूलें हिलाकर रख देना चाहता है और इस विचारधारा से प्रभावित स्त्रियाँ पुरुषों से नफरत करने लगती हैं. दरअसल ये सभी धारणाएँ भ्रामक हैं. नारीवाद एक विचारधारा और जीवन-शैली है. चूँकि स्त्री भी सोचना-समझना जानती है इसलिए मानवाधिकार की विचारधारा और उससे प्रभावित आंदोलन स्त्री-जीवन के लिए परिवर्तनकामी है. नारीवाद पर पड़े प्रभावों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि युग धर्म के अनुसार प्रचलित विचारों से स्त्री विचारक भी प्रभावित होती हैं. वे उन विचारधाराओं का विश्लेषण करके उन्हें अपने पक्ष में मोड़ना चाहती हैं.

महान चिंतकों के विचारों को स्त्री जब कार्यरूप में परिणत करना चाहती है तो उस दौरान उसे अपने जीवन के प्रसंग में इन विचारों की सीमा, उनकी अंतर्निहित पुरुष-केन्द्रीयता और स्त्री-द्वेष भी समझ में आता है. पुरुष-जीवन निजी और सार्वजिक दायरों में स्पष्ट रूप से बँटा हुआ है. सामाजिक मंचों पर नारी स्वतंत्रता की वकालत करनेवाला पुरुष जब घर में अपनी पत्नी को प्रताड़ित करता है तो उसे ऐसा करने की सुविधा इसी बँटवारे के कारण मिल पाती है. जाहिर है कि जब स्त्री व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं को, सार्वजनिक जीवन को उधेड़ना शुरू करेगी तो पुरुष-समाज को लगेगा कि निजी और सार्वजनिक दायरों में अंतर्विरोधी आचरण की सुविधा से वंचित हुआ जा रहा है. इस तरह नारीवाद निजी और सार्वजनिक से स्थापित विभाजन को बदलने की कोशिश करके पुरुष विरोधी होने के आरोप को नियंत्रित करता है. कहा जाता है कि नारीवाद पारिवारिक मूल्यहीनता को प्रश्रय देता है. या फिर वह पारिवारिक संरचनाओं को तोड़ देना चाहता है. वास्तविकता कुछ और है. अगर पारिवारिक संरचनाएँ मानवीय हैं तो अपनी वैचारिक संभावनाओं सहित नारीवाद परिवार और समाज के मानवीय मूल्यों को नष्ट करने के बजाय बचाना चाहेगा. वह पारंपरिक समाज-व्यवस्था को परिवर्तित जरूर करना चाहता है और बदलाव को टूटना तो नहीं कहा जा सकता. परिवार स्त्री की सबसे पुख्ता जमीन है. यदि इस जमीन पर खड़े होकर वह यथास्थिति के परिवर्तन के पक्ष में है और अन्य व्यापक सामाजिक जिम्मेदारियों को स्वीकारना चाहती है, तो इसे गलत क्यों कहा जाना चाहिए?

यह भी कहा जा रहा है कि बहनापे की अवधारणा बहुलतावादी दौर में पूरी तरह खटाई में पड़ चुकी है. वास्तविकता यह है कि इसी अवधारणा के चलते मार्गन जैसी चिंतक जमीन से जुड़े हुए स्त्री-आंदोलनों पर विमर्श पेश करने की कोशिश करती हैं. उनका तर्क है कि स्त्री एक वैश्विक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरती जा रही है. मार्गन के अनुसार चूँकि पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना ने हर देश की जमीन घेरी है इसलिए राष्ट्रीय संरचना पर पितृसत्तात्मक मानसिकता हावी हो जाती है, इसलिए इसके विरोध को सार्वभौम घटना के रूप में लिया जाना चाहिए. मार्क्सवादी विचारधारा भी पितृसत्ता के इस वर्चस्व से अछूती नहीं है. मार्क्सवादी राज्य एक तरफ स्त्री-हितों और उसके मानवीय पक्ष की पूरी तरह वकालत करता है लेकिन स्त्री के संदर्भ में राजकीय हस्तक्षेप के बावजूद स्त्री-आंदोलन की अलग पहचान स्वीकारने में असमर्थ रहता है. आधी दुनिया होने के कारण स्त्री की मुक्ति बहुसंख्यक जनता की मुक्ति की पर्याय समझी जानी चाहिए. दमन और शोषण के खिलाफ लड़ी जानेवाली अलग-अलग लड़ाइयों में स्त्री भी शामिल है लेकिन स्त्री-शोषण की अलग से चर्चा अनिवार्य है. वरना होता यह है कि वैचारिक स्तर पर मानवमुक्ति की चर्चा में चिंतक, दार्शनिक, विचारक और सामाजिक शोधकर्ता मान लेते हैं कि सबकी मुक्ति में स्त्री की मुक्ति भी शामिल होगी इसलिए अलग से स्त्री-हित की चर्चा की कोई तुक नहीं है.

इस पुस्तक में मैंने दार्शनिक विचारधाराओं की चर्चा की है जिनका मुझ पर प्रभाव पड़ा. इन विचारधाराओं को पढ़ते हुए मुझे यही लगा कि पुरुष होने की प्रक्रिया और स्त्री होने की प्रक्रिया में मौलिक अंतर है. पुरुष को पूर्वानुमानित रूप से व्यक्ति मान लिया जाता है पर स्त्री को यह स्वीकृति नहीं मिलती. देकार्त ने जब ऐलान किया था कि मैं सोचता हूँ इसलिए मेरा अस्तित्व है तो देकार्त का ‘मैं’ पहले तो उनका ‘मैं’ रहा और फिर उसमें अन्य पुरुषों का ‘मैं’ समाता गया. देकार्त के चिंतनशील ‘मैं’ का दायरा फैलता चला गया. पर क्या देकार्त के इस बृहदाकार ‘मैं’ में स्त्री शामिल थी? आखिर उसमें स्त्री क्यों नहीं शामिल होनी चाहिए थी? आखिर आदमी/इंसान/व्यक्ति में स्त्री-पुरुष दोनों ही निहित हैं. अत: देकार्त के अनुसार स्त्री भी कह सकती है कि मैं सोचती हूँ इसलिए मैं हूँ, मेरा अस्तित्व है. चिंतन करना व्यक्ति के युक्तिपरक होने का सबूत है. अपनी इस सामर्थ्य के कारण तो व्यक्ति जानवर से भिन्न होता है. बुद्धि एक सार्वभौम गुण के रूप में उभरती है जिसके कारण जानवर और इंसान की भिन्नता कायम रहती है. लेकिन स्त्री ने जब इस गुण का इस्तेमाल करते हुए अपने आप से, अपने परिवेश से और पुरुष की सत्ता से पूछा कि ‘क्या मैं इंसान हूँ?’ ‘क्या मेरी भी कोई मानवीय गरिमा है?’ तो उसे जो जवाब मिला वह कुछ और था. उसकी समझ में आ गया कि इंसान की श्रेणी में तो पुरुष है, स्त्री तो एक संपूरक भर है.

बहरहाल, अपनी दावेदारियों के साथ जैसे ही स्त्री ने अपने सारगुण, स्त्रीत्व, पर ध्यान केन्द्रित किया, वैसे ही उसे दिखाई पड़ा कि इस सारगुण के बावजूद, स्त्री और स्त्री में वर्ग, वर्ण और जाति की विविधताएँ हैं, रंग-भेद है उसे एक-दूसरे से विलग करती हुई राष्ट्रीय सीमाएँ हैं. सवाल उठा कि जिस स्त्री की चर्चा की जा रही है वह कौन है? किस जाति की और किस वर्ग की है? इस विविधता के कारण स्त्री से कहा गया है कि अलगाववादी चिंतन का परिणाम अच्छा नहीं होता और पहचान की राजनीति हीनभावना से प्रेरित होती है. यह भी कहा गया है कि केंद्र में आने की, मुख्यधारा में शामिल करने की माँग एक बचकानी माँग है क्योंकि केंद्र हैं ही कहाँ? केंद्र तो महज भाषा द्वारा निर्मित एक संकेतक-भर है. परिधि भी तो स्वयं में एक केंद्र है. स्त्री-पुरुष के बीच ऐसी कोई भी तो एक भेदक रेखा नहीं खींची जानी चाहिए. तर्क दिया गया है कि भेदक रेखा में जो स्पेस है वहाँ भी तो एक भेदक रेखा है. अत: ऐसी कोई भेदक रेखा होती नहीं.

भेदक रेखा तो बनती-मिटती रहती है, इसके लिए व्यर्थ परेशान होने की क्या जरूरत! स्त्री ने जब इन तर्कों को कसौटी पर कसा तो पाया कि उसका शोषण और दमन काल्पनिक नहीं, यथार्थ है. जिस भेद-भाव का स्त्री को अनुभव होता है, वह केवल भाषागत संरचना नहीं है. स्त्री को उसकी अधीनस्थता को इस कदर आत्मसात करा दिया गया है कि सत्ता की दमन कारी गतिविधियों को वह स्वीकारने लगी है. परंपरा ने उसे स्वास्थ्य, शिक्षा, राजनीतिक स्वतंत्रता और राजनैतिक भागीदारी और यहाँ तक कि व्यक्तिबोध जैसे मूलाधिकारों से भी वंचित रखा है. सत्ता द्वारा नियोजित यह वंचना ही स्त्री को राष्ट्र के दायरे में अपनी पहचान सीमित करने के खिलाफ विद्रोह का आधार प्रदान करती है. ये तमाम तर्क अनुचित साबित होते हैं कि स्त्री-मुक्ति की माँग जैसी अलगाववादी घटना न तो कभी हिंदू अतीत में घटी है और न ही हिंदू परंपरा में स्त्री कभी इतनी गुलाम रही है. यही हिंदुत्ववादी तर्क आगे बढ़कर कहता है कि स्त्री तो महाशक्ति के प्रतीक के रूप में पूजित है. बिना शक्ति के शिव तो महज शव हैं.

अत: नारी-मुक्ति की इन चर्चाओं के मूल में पश्चिम की अपसंस्कृति है. नैतिक स्तर पर ये पश्चिमी स्त्रियाँ हमारे सांस्कृतिक मूल्यों से अनभिज्ञ हैं और नैतिक-अनैतिक में भेद करने में असमर्थ हैं. स्पष्ट है कि स्त्री के संदर्भ में हिंदुत्व के ये सभी तर्क उसकी पहचान को राष्ट्र में सीमित करने के उपक्रम मात्र हैं. एक बार फिर स्त्री को राष्ट्रीयता बनाम साम्राज्यवाद के द्वित्व में से किसी एक को मानने के लिए मजबूर किया जा रहा है. जैसे ही वह राष्ट्रीय सीमाओं को लाँघने का प्रयास करती है, उस पर पश्चिमीकरण का आरोप जड़ दिया जाता है. नारी-मुक्ति की विचारधारा इस तरह के आरोपों की हमेशा से शिकार रही है. दरअसल, चाहे प्राचीन हो या अर्वाचीन, प्राच्य हो या पश्चिम, राष्ट्र हो या जातीयता, एक की कीमत पर दूसरे को जायज ठहराना या फिर तुलनात्मक रवैया अपनाना सत्तात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है. द्वंद्वात्मकता अनिवार्यत: एकत्वीकरण के सारे प्रयासों को बहुलता की स्वीकृति में परिणत कर देती है.

इसी मोड़ पर मुझे दांते द्वारा नरक के वर्णन का एक अंश याद आता है. नरक के दरवाजे पर पापात्माओं की भीड़ लगी थी और वे अपने-अपने झुंड़ों को कभी दायें तो कभी बायें हिला रहे थे. लेकिन वे साथ बैठकर किसी भी नैतिक या राजनीतिक मुद्दे पर बातचीत करने में असमर्थ थे. दांते का कहना है कि अपनी राय देने में कुछ कहने में असमर्थ लोग तो इतने जघन्य हैं कि नरक में भी प्रवेश के अधिकारी नहीं हैं. वे अपने कहे की जिम्मेदारी भी नहीं लेना चाहते. ऐसे लोग अपने किसी विचार पर टिकते भी नहीं. स्त्री की समस्याओं के संदर्भ में यह मनोवृत्ति और भी स्पष्ट होकर उभरती है. क्योंकि स्त्री समस्या स्पष्ट पक्षधरता की माँग करती है. राष्ट्र की सीमाएँ इसमें आड़े नहीं आनी चाहिए.

स्त्री का सवाल और राष्ट्रीय एकता का सवाल एक दूसरे के खिलाफ रखकर नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन ध्यान रहे कि स्त्री हो या पुरुष, पक्षधरता के कारण यथास्थिति से मिलने वाली सुविधाओं को छोड़ना पड़ता है, कीमत देनी पड़ती है जिसके लिए कोई तैयार नहीं है. स्त्री के हक सर्वसम्मति से नहीं दिये जा सकते. समकालीन जगत में स्त्री का प्रसंग एक नैतिक जिम्मेदारी की माँग करता है. आँकड़े उठाकर देख लीजिए: शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, रोजगार और व्यापार-जगत, हर जगह स्त्री-श्रम की कीमत पुरुष-श्रम से कम है. क्या इस आधार पर जनतांत्रिक मूल्यों का विकास संभव है? कार्य-जगत में यौन भेद-भाव और यौन-हिंसा भी कम नहीं है. स्त्री को पुरुष की तरह वोट का अधिकार है. पर स्त्रियों का प्रतिनिधित्व पुरुष वर्ग ही करना चाहता है. राजनीतिक जीवन में स्त्री की सक्रिय भागीदारी नहीं है. दुनिया के सारे सांसदों का दस प्रतिशत हिस्सा ही स्त्रियाँ हैं और केवल चार प्रतिशत स्त्रियाँ मंत्रालयों में हैं. केवल गरीबी ही स्त्री के लिए बाधक नहीं है. गरीब तो पुरुष भी है, अर्थाभाव तो वह भी झेलता है, जातिवाद का शिकार भी वह है. मगर पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री-विरोधी परंपराओं का आयाम पूरी तरह विशिष्ट है. ये परंपराएँ स्त्री को घर सौंपती हैं, बच्चों का भरण-पोषण सौंपती हैं. मानवता के नाम पर वृद्ध और बीमारों के लिए उससे नि:शुल्क सेवा लेती हैं और बदले में उसके द्वारा की गई सेवाओं का महिमा-मंडन कर अपने कर्तव्यों को इतिश्री कर लेती हैं. स्त्री भूखी है या मर रही है, इसकी चिंता किसी को नहीं होती.

पितृसत्तात्मक परंपरा ने निश्चित कर रखा है कि अधिक से अधिक शिक्षा पुरुष को मिलनी चाहिए, क्यों कि उसे कमाना है. उसे पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए क्योंकि उसके श्रम की कीमत है. पुरुष को इसलिए राजनीतिक चुनाव का अधिकार दिया गया है क्योंकि भेद-भाव करने और दूसरों का शोषण करने के मामले में वह ज्यादा ताकतवर साबित होता है. साथ ही वह अपने से भिन्न को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखता है. यहाँ तक कि विरोध और विद्रोह की अपेक्षा भी पुरुष से अधिक की जाती है. स्त्री के विरोध से सत्ता चौंकती है. गुजरात के दंगों में जब स्त्रियों ने लूटपाट मचाई, तो अधिकतर पुरुषों की नजर में यह चौंकानेवाली घटना थी कि ऐसा जघन्य काम पढ़ी-लिखी स्त्रियों ने कैसे किया! टिप्पणी की गई कि देखिए हमारी स्त्रियाँ कितनी नीचे जा रही हैं! क्या होगा हमारे धर्म का? कौन रक्षा करेगा हमारी जातीय अस्मिता की? आखिर स्त्री माँ है, संतति के भरण-पोषण की पूरी जिम्मेदारी उसी की है. विडंबना यह है कि स्त्री से नैतिक जिम्मेदारी की माँग करनेवाला समाज उसे आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों पर निर्णय के अधिकार से वंचित रखना चाहता है. जिसे अधिकार ही नहीं मिला उससे जिम्मेदारी की माँग क्यों की जा रही है? जो खुद गौण, दोयम और अधीनस्थ है, वह कैसे दूसरों के प्रति अपनी जिममेदारी निभायेगा?

दूसरे, संस्कृति के संदर्भ में सार्विकता एवं बहुलता की अवधारणा का स्पष्टीकरण जरूरी है. बहुसंस्कृतिवाद का अपना जोखिम है जिससे फिलहाल बचा नहीं जा सकता. फासीवादी संस्कृति के मूल्य स्त्री द्वारा स्वीकारे नहीं जाने चाहिए. गुजरात की हिंदू स्त्रियों ने मुसलमान स्त्री के साथ जो किया वह फासीवादी सांस्कृतिक मूल्यों का स्त्री-वर्ग द्वारा किया गया वरण है. क्या स्त्री के लिए कोई निरपेक्ष सार्विक प्रतिमान हासिल नहीं किया जा सकता? आलोचनात्मक सार्विकता के आधार पर प्रत्येक स्त्री-पुरुष के जीवन की गुणवत्ता को मापना संभव है. लेकिन आलोचनात्मक सार्विकवाद हमें परंपरा के इतिहास के प्रति संवेदनशील जरूर बना सकता है, मगर उसी हद तक जहाँ तक वह परंपरा स्त्री के विकास में सहायक हो, ताकि जीवन की गुणवत्ता और परंपरा के संबंध का आकलन करना संभव हो सके.

आलोचनात्मक सार्विकता स्थापित भूगोल की सीमा स्वीकारने के लिए कभी तैयार नहीं होगी. राष्ट्रवाद की अपनी सीमा है. राष्ट्रवाद चाहे फासीवाद द्वारा प्रचारित किया जा रहा हो या फिर चाहे वह कोई दमनकारी राष्ट्रवाद हो या किसी वर्ग विशेष का राष्ट्रवाद हो, वह अंतत: पहचान का दर्शन है. परिधि से उबरने की कोशिश में लगी हुई स्त्री को राष्ट्रवाद की जरूरत कुछ समय के लिए पड़ सकती है. राष्ट्रवाद के जरिए स्त्री को अन्य संस्थापितों के बीच पहचान मिलती है. पर यह तो पहला कदम ही हो सकता है. इसे आखिरी मंजिल तो नहीं कहा जा सकता. राष्ट्रवाद स्त्री को मजबूर करेगा कि वह केवल अपनी सांप्रदायिक, जातीय और वर्गीय पहचान और संसकृति को पुख्ता करे. इस प्रक्रिया में कई समस्याएँ हैं. 11 वीं शताब्दी का उपनिवेशवाद प्राचीन ब्रह्मणवाद की भौंडी नकल रहा है. उसने निचली जातियों को हीन बताकर मानव-संस्कृति की भव्यता और औदार्य से उन्हें वंचित रखनेवाली समाज-व्यवस्था को बदलने की चेष्टा नहीं की. हिंदू जब यह कहता है कि उसे पहले हिंदुत्व की रक्षा करनी है या केवल अपना जातीय साहित्य पढ़ना है, तो राष्ट्रवाद के नाम पर पहचान की राजनीति उभरती है. पहचान की राजनीति का एक दूसरा पहलू भी है. यह राजनीति स्त्री-मुक्ति आंदोलन को आत्मग्रस्त करेगी, सीमित करेगी. वह स्त्री खोयेगी ज्यादा, पायेगी कम। घेटो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हो या मदरसे का, जीवन के वैविध्य की ओर उनका ध्यान नहीं जा पायेगा. यदि भिन्नताएँ आपस में टकराती हैं, तो इन भिन्नताओं के साथ चलना सीखना होगा. उनका आपसी संवाद निरंतर होना ही चाहिए. स्त्री या दलित अपनी मूक खामोशी में भी बहुत कुछ बोलते हैं. सत्ता अपनी ऊँचाई से ऐसे खोखले नारे लगाती है, जो हमारी समझ से बाहर होते हैं. स्त्री सत्ता का विरोध करती है मगर विरोध के पीछे वह सत्ता की आकांक्षा नहीं रखती. उसे तो सत्ता से अलग हटकर और एक बेहतर दुनिया की खोज करनी है. महज आत्मश्लाघा और मुग्ध आत्मरति से कुछ नहीं मिलनेवाला. बल्कि स्वतंत्रता और मानवीयता की खोज अंतहीन होनी चाहिए, आकाश की अनंतता की तरह.

मान्यता है कि इंसान होने की पहली पहचान है किसी राज्य का नागरिक होना. तब क्या मानवाधिकार का सबसे सुरक्षित गढ़ राष्ट्रवाद है? क्या राष्ट्र की आलोचना करनेवाला देशभक्त नहीं हो सकता? स्त्री के अधिकारों की चर्चा करने पर पूछा जाता है कि वह किस राष्ट्र की नागरिक है? उसका धर्म, उसकी जाति, उसका संप्रदाय क्या है? इन सवालों का जवाब यह है कि नारीवाद को राष्ट्रीय सीमा में बंद नहीं किया जा सकता. सिद्धांत और विमर्श को इतिहास और व्यवहार से अलग करना होगा. राष्ट्रवाद से इतर यह कोई अकेली चीख नहीं होगी. बल्कि इसमें वैयक्तिकता की सामूहिक अवधारणा पर ध्यान दिया जाएगा. उन संबंधों से जुड़ने की प्रक्रिया से पहचान निर्मित होती है जिनके मूल में स्त्री का निजी और विशिष्ट इतिहास रहता है. साथ ही जुड़ी होती है स्त्री आंदोलन की सामूहिक राजनीति. स्त्री की पहचान बिखरी हुई भी हो सकती है, संबंधवाचक एवं सामूहिक भी. लेकिन स्त्री को पुरुष द्वारा अभिव्यक्त सांस्कृतिक आदर्शों की आलोचना करनी सीखनी होगी. स्थापित प्रतिमाओं के पीछे छिपी हुई सत्ता की नीयत को पहचानना होगा. स्त्री को अपने से भिन्न अन्य वर्ग, जाति और राष्ट्र की स्त्री-पुरुषों के संबंधवाचक संपर्क बनाने होंगे. चाहे वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, भूमंडलीय स्तर पर अब तक की राजनीतिक प्रक्रियाओं में स्त्री-प्रसंग में हमेशा विरोधाभासी विपर्यात्मक एवं विशिष्ट अर्थमयता ही प्रचलित रही है. जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि एक-दूसरे के बरखिलाफ जोड़ियों में सोचना ही चिंतन का तरीका रहा है. किंतु अब हमें यह या वह स्त्री या पुरुष, सक्रिय या निष्क्रिय, युक्तिसंगत या भावनात्मक आदि द्वित्वों का अतिक्रमण करते हुए किसी एकल व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाने के बजाय स्त्री-पुरुष को साथ-साथ रखते हुए दोनों की अपनी-अपनी पहचान के साथ जीना सीखना होगा.

एक समूचेपन की व्यवस्था करनी होगी. जो है, उसमें थोड़ा और जुड़ेगा. स्त्री को वैज्ञानिक आलोचना की पद्धति सीखनी होगी, ताकि अन्य आंदोलनों की सक्रियता में वह जाने-अनजाने स्त्री-मुक्ति के लक्ष्यों की अपेक्षा न कर बैठे. स्त्री कहीं अपने वर्गीय हितों को अपने राजनीतिक स्वार्थों के तहत गौण न बना दे. स्त्री स्थानीय संघर्ष कर रही है भूमंडलीय स्तर पर भी वह संघर्षरत होगी, एक समग्र दृष्टिकोण अपनायेगी. एक ओर यदि स्थानीय परंपरा, सापेक्षिक नैतिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक विरासत की समस्या है तो दूसरी ओर स्त्री को संस्कृतियों की सीमाओं के पार छानबीन और अन्वेषण करना होगा ताकि उसके आलोचनात्मक रुख से एक ऐसा वैश्विक दृष्टिकोण विकसित हो सके जिसके जरिए अपनी छद्म चेतना को बदलने में वह सक्षम हो सके. इस तरीके से न स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा होगी और न ही स्थानीय सीमाओं में कैद होकर रह जाना होगा.

बहुलता की माँग की वजह से स्त्री-जीवन भिन्न-भिन्न आवाजों से निर्देशित होता रहा है. पर बहुलता का अर्थ अलग-अलग खाँचों में बंद सांस्कृतिक मूल्यबोध नहीं है. संस्कृति के ऊपर है मनुष्यता, जो स्त्री को अब तक उपलब्ध नहीं हो सकी है. यदि होती तो दुनिया में इतना आतंक नहीं फैलता. स्त्री तो मनुष्य बनने की प्रक्रिया में है, उस ओर अग्रसर है. प्रत्येक स्त्री की अपनी-अपनी क्षमता है, सांस्कृतिक सामर्थ्य है. बहुलता की अवधारणा का समर्थन हमें एक कारगर संवाद की तरफ ले जाता है. यदि स्त्री-हितों की चर्चा की जी रही है तो प्रत्येक मानव स्त्री की बात हमें करनी होगी. स्त्रियों में जितनी भी बहुलताएँ हैं, उन्हें खुद को एक-दूसरे के समकक्ष समझना होगा और यदि हममें से अन्य कोई भी स्त्री शोषित होती है, हिंसा का शिकार होती है तो मानवीय मूल्यों का तकाजा है कि उस पर ध्यान दिया जाए ताकि इस मानव (और स्त्री) के प्रति नया दृष्टिकोण विकसित हो सके. स्त्री के प्रति अब तक मानवीय दृष्टिकोण निर्मित नहीं हो सका है. इन मुद्दों पर केवल पुरुष ही गौर करते रहे.

स्त्री यदि एक बार अपनी समस्याओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण निर्मित कर पाती तो पितृसत्तात्मक धार्मिक एवं सांस्कृतिक योजनाएँ स्वत: खारिज हो जातीं. दलित एवं शोषित अपने बारे में सही निर्णय लेने में समर्थ नहीं हैं क्योंकि लंबे समय तक अधीनस्थ रहने की वजह से उन्होंने सत्ता के मूल्यों को इतना आत्मसात कर लिया है कि उनकी आलोचनात्मक क्षमता कुंद हो गयी है. इसीलिए आत्माभिव्यक्ति को और तराशने की जरूरत है. स्त्री अपनी पक्षधरता अवश्य विकसित करे और बोले, मगर उसका वक्तव्य आत्मरति से ग्रस्त न हो. यही कारण है कि स्त्री को आज मानव-मूल्यों पर आधारित शिक्षा की वकालत करनी है ताकि चिंतन का स्तर और विकसित हो, व्यक्ति की सोच स्थानीय सीमाओं से बाहर निकले, वह धार्मिक मतान्धता की शिकार न हो. हाँ, उस प्रक्रिया में वैकल्पिक जीवन-मूल्यों का संकेत जरूर मिले ताकि बिना किसी दबाव और भय के वह शिवम् की अवधारणा विकसित कर सके.

-----------प्रभा खेतान, उपनिवेश में स्त्री (मुक्ति-कामना की दस वार्ताएँ) का एक अंश

Thursday, June 19, 2008

वर्तमान धर्म-संकट








यह कहना की मानव-जाति आज इतिहास के महत्तम संकट के बीच से गुज़र रही है, एक सामान्य सत्य है. हमारी यह संकटापन्न स्थिति मानवात्मा के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी की आश्चर्यजनक गति का समञ्जन न होने के कारण उत्पन्न हुई है. इस तथ्य के होते हुए भी कि महान् वैज्ञानिक आविष्कारों में हमें प्रकृति की दासता से मुक्त कर दिया है, हम एक प्रकार के मनोरोग से, एक प्रकार के सांस्कृति विघटन से पीड़ित दिखाई पड़ते हैं. विज्ञान ने हमें पीसती हुई गरीबी के पंजे से कुछ अंश तक छुड़ा दिया है, और शारीरिक वेदना के उत्पीणन का शमन कर दिया है. फिर भी हम एक प्रकार के आन्तरिक एकाकीपन से पीड़ित हैं. समस्त विकास वेदना से आलोड़ित होता है; संपूर्ण संक्रमण दुःखान्तिका का क्षेत्र है. परन्तु यदि हमें जीवित रहना है तो आज जिस संक्रमण को क्रियान्वित करना है, वह एक ऐसी नैतिक एवं आध्यात्मिक क्रांति है जिसकी गोद में सम्पूर्ण विश्व आ जाता है.

हमने मानव-जाति के इतिहास में दूसरी क्रान्तियाँ भी देखी हैं; जब कि हमने आग जलाने की विधि का आविष्कार किया, जब हमने पहिए का अन्वेषण किया, जह हमने वाष्प का प्रयोग किया, जब हमने विद्युत का आविष्कार किया. किन्तु आणविक ऊर्जा के विकास के कारण हुई वर्तमान क्रान्ति की तुलना में ये सब अपेक्षाकृत महत्त्वहीन हो गई हैं. आणविक ऊर्जा के अविष्कार में न केवल मानवीय प्रगति की महती सम्भावनाओं को उपस्थित कर दिया है अपितु अव्यवहित एवं सम्पूर्ण विध्वंश के खतरे को भी सामने ला दिया है. यह सब पर्वतों को हिला सकती है; सुरंगें खोद सकती है; खाद्योत्पादन में वृद्धि कर सकती है; यह संसार के सम्पन्न एवं भूखे लोगों के बीच की खाई को पाट सकती है और कुछ ऐसे प्रमुख कारणों को भी दूर कर सकती है जिनको लेकर अब तक युद्ध होते रहे हैं; या फिर यह विश्व की मानव जातियों को मृत्यु और विनाश दे सकती है.

आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य की बुराई करने तथा बुराई रोकने-दोनों प्रकार की शक्तियों को बढ़ा दिया है. मानवता के सामने आज नियति की चुनैती उपस्थित है. हम इस चुनौती का सामना कर सकते हैं और एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं जिसमें सार्वदेशिक सत्ता द्वारा प्रचारित कानून के शासन में समस्त सम्बद्ध राज्यों को विकास की स्वतन्त्रता प्राप्ति हो, या फिर यह हो सकता है कि जो महती शक्ति हमारे हाथ में है वह शस्त्रसज्जित दलों के द्वन्द्व में हम सबको ही विनष्ट कर दे.

युद्ध का मूल कारण अधिकृत क्षेत्रों का लाभ नहीं, एक-दूसरे के प्रति भय एवं घृणा है. जब तक ये बने रहेंगे, नौसन्तरण की ज़रा-सी भूल से, राडार-प्रणाली पर एक गलत छाया दिखाई पड़ने के कारण, एक क्लान्त वैमानिक एक बीमार अफसर या किसी दूसरी घटना के कारण, युद्ध छिड़ जा सकता है. राष्ट्रों के एक परिवार के रूप में रहकर, शान्ति एवं स्वतन्त्रता के बीच, एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के मानवता के लक्ष्य तथा इस वर्तमान प्रणाली के बीच, एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के मानवता के लक्ष्य तथा इस वर्मान प्रणाली के बीच-जिसने हमें विश्व-युद्ध दिए हैं, यान्त्रिक समाज की ओर सार्वभौम प्रगति दी है और युयुत्स भौतिकवाद दिया है-एक संघर्ष है. भविष्य अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के प्रति हमारी वृत्तियों में तीव्र परिवर्तन की माँग कर रहा है. यद्यपि हम समझते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों के निबटारे के लिए सैनिक समाधान के विचार का त्याग करना आवश्यक है और मानव-जाति के कल्याण के निमित्त हमें अपनी राष्ट्रीय निष्ठाओं पर अंकुश रखने की आवश्यकता है, फिर भी हमारे राजनीतिक नेता वही पुरानी दुरभिसन्धियों एवं धमकियों, सौदेबाजियों और छल-छद्म को जारी रखे हुए हैं, मानो धनुष-बाण, तोप-तलवार के जीर्ण अस्त्र-शस्त्र अब भी विजयी होंगे.

सत्ता की जो राजनीतिक अन्तरशासकीय सम्बन्धों की पारम्परिक प्रणाली का ध्रुव-सिद्धान्त रही है, अब भी चल रही है, यद्यपि उसने नाना प्रकार के छद्मवेश बना लिए हैं. आणविक युग में सत्ता की राजनीति का तार्किक परिणाम जागतिक आधिपत्य नहीं, वरन् जागतिक नर-संहार होगा. यदि समर न हो तो स्वयं आणविक परीक्षण ही मानव कल्याण के विनाशक है. हमारे कुकृत्य ही मानव के सम्पूर्ण भविष्य को नष्ट कर देंगे. हमको यह स्वीकार ही होगा कि हम सैनिक पथ के अन्तिम बिन्दु पर आ पहुँचे हैं. जब काल्विन ने सर्वीतस को जलाया था तब कोस्टले ने कहा था—‘‘किसी आदमी को जलाना धर्म का रक्षण नहीं, बल्कि मनुष्य की हत्या है.’’ हम अपने चतुर्दिक् के शत्रुओं से अपनी सुरक्षा के लिए शस्त्रों का निर्माण कर रहे हैं किन्तु शत्रु तो हमारे ही अन्दर है.

राष्ट्रवाद अब भी एक बड़ी ताकत है. उच्छेदक आयामों वाले विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्र-संघ (लीग ऑफ नेशंस) का जन्म हुआ. जब तोपें पुनः दहाड़ने लगीं तो संघ समाप्त हो गया. जब द्वितीय विश्व-युद्ध के पश्चात् विजय हुई तो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (शासन-पत्र) पर हस्ताक्षर हुए. अभी वह जीवित सत्य नहीं बन पाया है. संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में भी राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाएँ चलती हैं. यद्यपि वह अपने सिद्धान्त-समूह एवं मूल्य-व्यवस्था द्वारा, समस्त मानवता की शक्तियों एवं हितों के अनुकूल, एक स्वतन्त्र एवं शान्तिमय विश्व लोक-सामज के निर्माण के लिए प्रयत्नशील है, उसके कार्य में संघर्षशील सत्ता-समूहों द्वारा बाधा पड़ती है. सदियों से कोटि-कोटि मानवों का पथ-दर्शन इस नारे से होता रहा है—‘हमारा देश, सही हो या गलत’ जो लोग राष्ट्रसंघ संस्थान का निरीक्षण करते हैं और राष्ट्रीय भाव-प्रवणता और शस्त्रीकरण की दौड़ पर ध्यान देते हैं वे गंभीर रूप से निराश हो जाते हैं और अनुभव करते हैं कि हमारी सभ्यता गर्त की कगार पर खड़ी है. वे कहते हैं कि इस विचार में कुछ भी असाधारण नहीं है, कि कला एवं विज्ञान, साहित्य एवं दर्शन सम्बन्धी अपनी संपूर्ण आश्चर्यजनक उपलब्धियों के साथ भी, हमारी सभ्यता उसी प्रकार विलुप्त हो जायेगी जिस प्रकार कि अतीत में और भी कितनी ही सभ्यताएँ नष्ट हो गई हैं. इक्माइरोसिस के संयमवादी (स्टोक)1 सिद्धान्त में कहा गया है कि संसार अग्नि से नष्ट हो जाएगा, स्लेट पुँछकर साफ-सुथरी हो जाएगी और एक नवीन आरम्भ होगा.’ अनेक प्रमुख धर्मशास्त्री हमें विश्व के समाप्ति-सम्बन्धी धर्मशास्त्रीय विवरणों की याद दिलाते रहते हैं और कहते हैं कि यह भगवत्-इच्छा के ही अन्तर्गत है कि मानव-जाति समाप्त हो जाए.

दुर्भाग्यवश जो लोग वैज्ञानिकमना हैं वे मानवीय घटनाओं की अनिवार्यता की बात करते हैं. हमें विश्वास कराया जाता है कि आर्थिक एवं राजनीतिक शक्तियों का दबाव संसार को ऐसी तबाही की ओर ले जा रहा है जैसे कि यूनानी दुःखान्तिका में निर्मम नियति द्वारा सम्पन्न होती है. इतिहास की धारा कारणों एवं परिणाम की एक ऐसी श्रृंखला है जिसमें मानव अनुन्मोचनीय रूप से जकड़ा हुआ है. मानव सम्पूर्णतः इतिहास की दया पर निर्भर है. मानव की आशाओं, भयों और अपेक्षाओं का भविष्य पर कोई प्रभाव नहीं. कहा जाता है कि हम अपने से अधिक बलवती शक्तियों की पकड़ में हैं. हमें बताया गया है कि बड़े-बड़े मामलों में घटनाओं के भीतर उसके मन में, उससे कहीं अधिक होता है जितना उसके अभिनेताओं के मन में होता है. सामूहिक वातोन्माद (हिस्टीरिया) कोटि-कोटि मानवों के जीवन को विनष्ट कर देता है. प्रकृतिवाद की धारा मानव-प्राणियों को साहस और पहल की ओर प्रेरित नहीं करती.
पौराणिक नियतिवाद (थियौलाजिकल डिटरमिनिज़्म) व्यक्ति से उसकी अपनी महत्ता, विशेषता छीन लेता है. ईश्वर ब्रह्माण्डीय गतिविधि को अपनी योजना द्वारा ही उसके गन्तव्य तक पहुँचता है. पुस्तक के अन्तिम पृष्ठ पहिले से ही उसके प्रथम पृष्ठों में निहित हैं.परन्तु जहाँ सर्वनाश के पैगम्बर मौजूद हैं, वहाँ आशा के प्रवक्ता भी हैं, यद्यपि वे निराशा के गर्त पर ही आशा का महल बनाते हैं. वे कहते हैं कि हम अपने अन्तः करण की खोज करके उसमें इस अणुयुग में अपनी नैतिक जिम्मेदारियों का पता लगा लें. कवियों, दार्शिनिकों और पैगम्बरों में मानवीय एकता और सनातन शान्ति की बाध्यकारी दृष्टि मिलती है. राजनीतिक नेताओं में भी इसे प्रमाणित किया है. टॉम पेन ने घोषित किया है—‘‘विश्व ही मेरा देश है.’’

आधुनिक मानव की दुविधा यह है कि यद्यपि वह जीवन से निराश है, किन्तु मरना नहीं चाहता. जीवित रहने की मूलवृत्ति हमें आशा देती है. जिस शत्रु से हमें लड़ना है, वह पूँजीवाद अथवा साम्यवाद नहीं है, वह हमारी अपनी बुराई है, हमारी आध्यात्मिक अन्धता, सत्ता के प्रति हमारी आशक्ति और प्रभुत्व के लिए हमारी वासना है. 1945 ई. में एक निराशावादी नृतत्त्वविज्ञानी ने कहा था कि बन्दर के हाथ में अणुबम जैसा अस्त्र देना सभ्यता के विनाश की गारण्टी करना है.

हम जानते हैं कि हमें अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की एक नई बानगी के लिए प्रयत्न करना चाहिए, किन्तु जीवन के पारम्परिक मार्गों और खींचतानों के कारण हम शिथिल हो जाते हैं. यदि भविष्य की रक्षा करनी है तो हमें अपने को गूढ़ विश्वासों की इस निद्रा से धकेलकर निकलना होगा. प्राचीन परम्पराओं तथा नवागत समाज-वैशिष्ट्य में संघर्ष है. समस्त जीवन ही पुरातन और नूतन के बीच सनातन द्वन्द्व है. नायक बनी हुई वस्तुओं का नहीं, वरन बनती हुई वस्तुओं का योद्धा है. जिस राक्षस को मारना है वह तथातथ्य का राक्षस है. शत्रु सत्ता के स्थान पर है; वही जालिम है जो अपनी शक्ति सत्ता का अपने हित में उपयोग करता है.

प्राकृतिक आत्महत्या के अनेक मार्ग हैं किन्तु मानव के जीवित बचे रहने का एक ही रास्ता है. यह है निष्ठा का, श्रद्धा का, धर्म का मार्ग जो हमें आने वाली वस्तुओं के लिए शक्तिमती आशा से प्रेरित करता है. मानवीय विषयों में कोई नितान्त कारणत्व नहीं हुआ करता.
संघर्ष है चेतन अभिप्राय एवं अचेतन मनोवेग के बीच। मनुष्य भलाई-बुराई का, ज्ञान एवं मूढ़ता का मिश्रण है. हमें स्वयं अपने से, दुर्बलता से, अपनी प्रकृति मे निहित भ्रष्ता से अपनी रक्षा करनी है. यह विश्व पतित मानव का घर है, जहाँ विवेक राज्य होना चाहिए किन्तु राज्य है वस्तुतः अविवेक.
[1.308 ई. पू. एथेंस में ज़ीनो द्वारा स्थापित एक सम्प्रदाय के दार्शनिक.]

सर्वेपल्लि राधाकृष्णन्, भारतीय संस्कृति कुछ विचार का अंश साभार

Saturday, June 14, 2008

विकास का सांस्कृतिक आधार









जब हम एशिया में हुए पिछले पचास वर्षों के विकास-प्रयासों पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं कि विकास के तीन मुख्य मॉडल अपनाये गये और तीनों अलग-अलग विचारधाराओं पर आधारित थे. अपनायी गयी विचारधारा ने विकास प्रक्रिया को प्रभावित तथा प्रोत्साहित किया और विकास को नये मोड़ दिये. अनेक देशों ने स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए आधुनिकीकरण के पश्चिमी मॉडल को अपनाया. यह विकास का पूँजीवादी मॉडल था. कुछ ने राष्ट्र-निर्माण का क्रान्तिकारी रास्ता चुना. उनके सामने सोवियत समाजवादी पुनर्रचना का मॉडल था. बाद में चीन के जनवादी गणतन्त्र तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बने समाजवादी देशों से भी उन्होंने प्रेरणा ली. इन समाजवादी प्रयोगों का वैचारिक आधार तो एक ही था, परन्तु कार्यक्रमों का क्रियान्वयन राष्ट्रीय सन्दर्भों तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार किया गया. शेष देशों ने अपने-अपने स्वयं के मॉडल बनाये। कहीं नियन्त्रित लोकतन्त्र की बात कही, कहीं बुनियादी लोकतन्त्र का नाम लिया और इसी तरह के अन्य रूपों को अपनाया गया. अधिकतर इन प्रयासों के माध्यम से तत्कालीन सत्ता के ढाँचे को सही सिद्ध करने की कोशिश की गयी. इन देशों में अपनी स्वतन्त्र राह अपनाने की बात कही गयी थी, परन्तु उनके इस दावे में विश्वसनीयता नहीं थी. मुख्य मॉडल दो ही थे. स्वतन्त्र राह की बात करने वाले कभी पश्चिमी पूँजीवादी व्यवस्था की ओर झुकते थे और कभी समाजवादी व्यवस्था की ओर। इन देशों में से अधिकांश ने पश्चिमी व्यवस्था को अपनाया. लक्ष्य निर्धारण के प्रेरणा-स्त्रोतों को समझने के लिए आवश्यक है कि विकास के इन तीनों रूपों की गम्भीरता से विवेचना की जाए.

पहले पश्चिमी मॉडल पर विचार करें. 1940 के दशक के अन्तिम तथा 1950 के आरम्भ के वर्षों में तीसरी दुनिया में उत्साह का वातावरण था. उपनिवेश तथा आश्रित देश राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर रहे थे और अपने-अपने राष्ट्रीय विकास की महत्वकांक्षी रूपरेखाएँ बना रहे थे. उन्हें आशा थी कि योजनाएँ बनाकर तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहायता एवं तकनीकी पथ-प्रदर्शन का सहारा लेकर वे अपनी बीमार अर्थ-व्यवस्थाओं को बदल डालेंगे और इसी के साथ सम्पन्नता और समृद्धि के युग का प्रारम्भ हो जाएगा. वे मात्र दो दशकों में औद्योगिक विकास के उस स्तर को प्राप्त करने की आशा लगाये थे जिसको प्राप्त करने में पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमरीका को दो सौ साल लगे थे. धनी और औद्योगिक क्षेत्र के अधिक विकसित देशों में विकास विशेषज्ञों की रातों- रात पैदा होने वाली फ़ौज ने विकास के आकर्षक और अपरीक्षित नुस्ख़े प्रस्तुत किये जिनसे इन अप्रत्याशित आशाओं को बढ़ावा मिला.

बीस साल बाद तीसरी दुनिया के सोच का ढंग अधिक यथार्थवादी बना. उन्हें यह अहसास हुआ कि आज़ादी के उल्लास में तीसरी दुनिया के देशों ने अपनी क्षमताओं और सम्भावनाओं का आकलन बहुत बढ़-चढ़कर किया था. तथाकथित अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने अपनी सीमित विशेषज्ञता को अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किया था. उनका यह ज्ञान अज्ञानियों को गर्वोक्ति सिद्ध हुआ. उनके द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रगति का प्रतिरूप असफल हुआ और वह चमत्कार नहीं हुआ जिसकी आशा विकासशील विश्व को थी.

विकास की इस प्रारम्भिक अवधारणा की कमियाँ अब स्पष्ट थीं, तीसरी दुनिया की समझ में आ गया था कि विकास की प्रक्रिया में अनेक उलझाव हैं और इसमें एक-दूसरे से जुड़े अनेक ऐसे तत्व हैं जो देश और काल के अनुसार परिवर्तनशील हैं. विकास ऐसी सीधी और सरल प्रक्रिया नहीं है जिसमें हिसाब लगाकर निवेश किया जाए और तदनुरूप उत्पाद पा लिया जाए. प्रौद्योगिकी के स्थानान्तरण में भी अनेक कठिनाइयाँ होती हैं. कभी –कभी यह सुझाव भी दिया गया कि विदेशी संस्थाओं को भी अपनाया जाए, परन्तु संस्थाओं का स्थानान्तरण असम्भव पाया गया. नयी प्रौद्योगिकी को अपनाने में समय लगता है और इसके लिए धीरज और सतत नवाचार की आवश्यकता होती है. उसकी उपयुक्तता का पता प्रयासों की सफलता और असफलता से ही लगता है. विकास के अनुरूप संस्थात्मक तथा प्रेरणात्मक ढाँचा बनाते समय अनेक विरोधाभासों और जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ता है. असफलता के अनेक बहाने खोजे जाते हैं, परन्तु इनसे एक झूठा सन्तोष ही मिलता है और उनसे निश्चित समय में प्राप्त की जानेवाली प्रगति का कारगर रास्ता नज़र नहीं आता. आवश्यक है कि हम पिछले अनुभव की पृष्ठभूमि में विचार करें कि विकास का पश्चिमी प्रतिरूप असफल क्यों हुआ और इस आधार पर विकल्पों को निर्धारित करने का प्रयत्न करें. इसका अर्थ है कि हमें विकास की अपनी अवधारणा तथा तत्सम्बन्धी कार्यप्रणाली पर गम्भीरता से पुनर्विचार करना चाहिए.

यह आश्चर्य की बात है कि विकास के अभिप्राय की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गयी. विकास के सूचक-विकास दर, सकल राष्ट्रीय उत्पाद और प्रति-व्यक्ति औसत आय-पूरी तरह आर्थिक मापदंड ही माने गये, सामाजिक और सांस्कृतिक सूचकों की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया. यह मान लिया गया था कि इन आर्थिक सूचकों के आधार पर प्राप्त किये गये राष्ट्रीय लाभ किसी-न-किसी तरह नीचे पूरी जनता तक पहुँच जाएँगे. वास्तव में हुआ यह कि विकास के लाभों का बड़ा भाग समाज के उच्च वर्ग को मिला, जिसके हाथ में उत्पादन के साधन थे. इस तरह एक नया शोषक वर्ग विकसित हुआ. इस आर्थिक क्रिया-कलाप को दिशा देने वाले प्रमुख समूह ने विशेष लाभ प्राप्त कर लिये, समाज का गरीब वर्ग इन लाभों से प्रायः अछूता रहा. आम गरीब जनता को ऐसे विकास का नाम-मात्र का लाभ मिला, और यह लाभ भी राज्य के द्वारा दी जाने वाली सामाजिक सेवाओं के रूप में था. गरीबी और अमीरी के बीच की दूरी बढ़ी. समाज में अल्पसुविधा प्राप्त गरीबों का अनुपात बढ़ा. गरीबी की रेखा से नीचे की जनता से त्याग और सेवा की अपीलें अर्थहीन थीं, वे बलिदान और सेवा करने के लिए अपने जीवन के अविश्वसनीय रूप से नीचे स्तर से और अधिक नीचे जा ही नहीं सकते थे. विकास–योजनाओं में इन वर्गों के प्रति थोड़ा दिखावटी प्रेम प्रदर्शित किया गया, ‘समाजवाद’ और ‘वितरणात्मक न्याय’ के आकर्षक नारे दिये गये। ये दीर्घकालीन उद्देश्य थे, जो कभी सूदुर भविष्य में ही प्राप्त होने थे. इन उद्देश्यों की बात तो कही गयी परन्तु उनको प्राप्त करने का कोई समयबद्ध कार्यक्रम नहीं बनाया गया. जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की ओर समुचित ध्यान भी नहीं दिया गया. तथ्य यह है कि पूरा मॉडल अन्ततः उपभोक्तावादी समाज का था और उपभोक्तावाद ही उसका मुख्य दर्शन था. उच्च वर्ग को दोनों प्रकार के लाभ थे, एक ओर उन्होंने विकसित दुनिया की नयी आवश्यकताओं, उपभोक्तावादी संरचना और यन्त्रवाद को अपनाया, और दूसरी ओर तीसरी दुनिया की सामन्तवादी विलासिता और औपनिवेशिक दृष्टिकोण को क़ायम रखा. अधिकांश जनता को कम मज़दूरी पर काम करना पड़ा या बेरोज़गारी का सामना करना पड़ा. इस प्रकार सामान्यजन के ग़रीबी और दुख भरे जीवन के बीच एक छोटा-सा समूह समृद्धि के असाधारण रूप से ऊँचे स्तर का उपभोग कर रहा था. इस दुखद स्थित का विकल्प खोजने का प्रयास ही नहीं किया गया-एक ऐसा विकल्प जिससे इस दुखावस्था में रहने वाले ग़रीबों को ऐसा जीवन स्तर प्राप्त हो सके जो मानवीय दृष्टि से पर्याप्त और सम्मानजनक हो. अधिकांश सत्ताधारी जनता के सामने क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत किये थे, परन्तु अपने व्यक्तिगत जीवन में वे उपभोक्तावादी दर्शन का अनुसरण करते थे. अनियन्त्रित स्वार्थ और असीम लिप्सा के कारण इस विशिष्ट वर्ग के सामान्य जनता का विश्वास खो दिया. आखिरकार वे जनता को क्या दे सकते थे? केवल वायदे, और उन वायदों का पूरा होना निकट भविष्य में सम्भव नहीं दिखायी देता था.

आर्थिक विकास को एक रास्ते पर चलना था और उसे कुछ अवश्यम्भावी अवस्थाओं से गुज़रना था. जो प्रौद्योगिकी अपनायी गयी वह पश्चिम में विकसित हुई थी और इसलिए वह पश्चिमी सामाजिक वातावरण के अनुरूप थी. पश्चिमी प्रौद्योगिकी अधिकांशतः सघन पूँजी निवेश पर आधारित थी, इसलिए वह उन देशों के लिए उयुक्त नहीं थी जहां पूँजी की कमी थी और श्रम बहुतायत से उपलब्ध था. ऐसी प्रौद्योगिकी को अपनाने से रोज़गार के अवसर बहुत कम बढ़े और बढ़ती हुई बेरोज़गारी के संकट को कम करने में अधिक सहायता नहीं मिली. अल्प विकसित देशों में बेरोज़गारी की बढ़ती हुई संख्या एक कष्टदायक तस्वीर प्रस्तुत करती है. इस प्रौद्योगिकी के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता थी, और यह ऊर्जा या तो आन्तरिक स्रोतों से प्राप्त होनी थी-ऐसे आन्तरिक स्रोत जिनका पुनर्भरण नहीं हो सकता था, या फिर बाह्य स्रोतों से; और जिनके पास ये बाह्य स्रोत उपलब्ध थे उन्हें इन पर लगभग एकाधिकार प्राप्त था और इसलिए वे उनकी मनमानी कीमत वसूल कर सकते थे. जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही थी, उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बड़ी मात्रा में उपयोग हुआ. इससे निकट भविष्य में संसाधन-समाप्ति का संकट उपस्थित हो गया. औद्योगिक उत्पादन का एक बड़ा भाग केवल विशिष्ट वर्ग के उपभोग से जुड़ा था और सामान्य जन की व्यक्तिगत तथा सामुदायिक आवश्यकताओं से इसका बहुत कम सम्बन्ध था.

यह विकास भी निर्भरता के ढाँचे के अन्तर्गत होना था. विदेशी तकनीकी ज्ञान ऊँची कीमत पर खरीदा गया. काफ़ी हानि हो जाने के बाद तीसरी दुनिया को पता चला कि अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सहायता और ऋण सदैव सदाशयता के कारण नहीं दिये गये थे. इन सहायताओं और ऋणों से अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष शर्तें जुड़ी हुई थीं. आज अनेक देशों को लगभग उतना ही धन वापस करना पड़ता है जितना वे ऋण के रूप में लेते हैं. ऋण भुगतान का चक्र एक संवेदनशील विषय है और इससे ग़रीब राष्ट्रों और अमीर राष्ट्रों के सम्बन्ध प्रभावित होते हैं. इसमें ग़रीब देश हानि में रहते हैं. विदेशी सहायता के बारे में सोचा गया था कि यह एक अस्थायी व्यवस्था है, परन्तु अब वह एक स्थायी आवश्यकता बनती जा रही है, और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह सहायता, उन देशों के हाथ में शक्ति का स्रोत बन गयी है जो उसे देते हैं. सहायता देने वाले प्रभावशाली देश सहायता पाने वाले देशों पर खुला राजनीतिक प्रभाव डालते हैं कि वे ऐसी नीतियों को अपनाएँ जिनसे सहायता देनेवाले देशों का हित हो. परोक्ष रूप से उन्होंने अनेक प्रकार के दबाव डाले हैं, जिनमें से कुछ का अर्थ है सहायता प्राप्त करनेवाले देशों की स्वतन्त्रता और सम्प्रभुता का परिसीमन। सहायता और ऋण समझौतों में निरापद दिखाई देनेवाली शर्तों से भी सहायता देनेवाले देशों के हितों की रक्षा हुई, सहायता प्राप्त करनेवाले देशों को अनेक सेवाएँ तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय दरों की तुलना में अधिक मूल्य पर ख़रीदनी पड़ीं. सहायता देने वाले देशों को यह पसन्द नहीं था कि विकासशील देश अपनी मर्ज़ी की स्वतन्त्र नीति पर चलें. आत्मनिर्भरता के उनके प्रयासों के ग़लत समझा गया. स्वतन्त्र मार्ग पर चलने का प्रयास करनेवाले देशों को सहायता बन्द करने की प्रत्यक्ष और परोक्ष धमकियाँ दी गयीं. विदेशी सहायता विकासशील देशों में नव-उपनिवेशवाद का आधार तैयार करने और उसे क़ायम रखने का साधन बनी. विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को आश्रित व्यवस्था की भूमिका निभानी पड़ी.

तीसरी दुनिया जानती है कि समकालीन विश्व अर्थव्यवस्था अन्तर्निहित अन्याय पर आधारित है, इसलिए यह आवश्यक है कि इसका ढाँचा बदले ताकि विकासशील देशों को अपने संसाधनों के उपयोग और मानव जाति की उत्पादन-प्रक्रिया में सार्थक हिस्सेदारी मिल सके. उन्होंने समझ लिया है कि ‘प्रगति की सीमाओं’ का निहित अर्थ विकसित देशों की अपेक्षा अविकसित देशों पर अधिक रोक लगाना है. उनको सलाह दी जाती है कि वे पृथ्वी के प्रदूषण को और न बढ़ाएँ, इस उपदेश का उद्देश्य सराहनीय प्रतीत होता है परन्तु इसका पालन सम्भव नहीं है, इसलिए विकासशील देशों को यह उपदेश सुनकर उलझन होती है. तीसरी दुनिया ने ‘जीवन नौका सिद्धान्त’ के बारे में भी सुना है, जिसका आशय है कि तीसरी दुनिया के उन जीवन-क्षम देशों को ही सहायता दी जाए जिनमें कुछ ऊर्जा शेष है और जो ऐसी सहायता का उपयोग करने में सक्षम हैं. शेष की चिन्ता व्यर्थ है. क्या विकासशील देशों के निवासी हम सर्वनाश की आखिरी मंजिल पर पहुँच गये हैं ?
विकासशील देशों ने अब उन मानवीय क़ीमतों का अनुमान लगाना शुरू किया है, जो नयी टेक्नॉलोजी के मार्ग पर चलने में उन्हें चुकानी पड़ती हैं. पश्चिमी मॉडल पर आधारित विकास की सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं और सामाजिक संरचना के परिवर्तनों ने उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता और पहचान के लिए संकट खड़ा कर दिया है. चाहे जो भी कारण हो, विकास के जैसे परिणामों का वायदा था, वे सामने नहीं आये. प्रश्न है, क्या हम इन वायदों के लाभों के लिए अपने सांस्कृतिक व्यक्तित्व को हास्यास्पद हो जाने दें ? इस दौरान उद्योग के क्षेत्र में प्रगत पश्चिम में भी तनाव के चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं; तीव्र गति से होने वाले औद्योगीकरण से उत्पन्न सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का मुक़ाबला करने में वह अपने-आपको अक्षम पा रहा है. अब तक ग़रीब देश भयमिश्रित आदर से पश्चिम के विशेषज्ञों की राय और आलोचना को सुनते थे; अब उन्हें मालूम हो गया है कि तथाकथित सर्वज्ञान सम्पन्न विशेषज्ञों ने उनके साथ छल किया है. जिनको उन्होंने देवता समझा था, वे मिट्टी के माधो निकले. जिस विकास और उन्नति के स्तर का वायदा था, वह नहीं मिला. इसलिए स्वाभाविक है कि आज तीसरी दुनिया के देश अपनी आवाज सुनना चाहते हैं और एक वैकल्पिक मार्ग अपनाना चाहते हैं जिससे वे अपने भविष्य का निर्माण कर सकें.

कुछ देशों ने विकास का दूसरा रास्ता चुना, यह क्रान्ति का मार्ग था. मार्क्स और लेनिन के मूल-भूत सिद्धान्तों पर चलते हुए, इन देशों ने सत्ता के वर्ग आधार को ढहा देने का प्रयास किया और सामाजवादी आधार पर अपने समाज की पुनर्रचना करने का प्रयत्न किया. सोवियत संघ में यह किया जा चुका था और वही इसकी प्रेरणा थी. इन देशों को कुछ अंश में राजनीतिक समर्थन, आर्थिक सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उन देशों से प्राप्त होता रहा जिनसे उनकी वैचारिक समरूपता थी. अधिकांश देशों ने क्रान्ति के मार्ग और क्रान्तिकारी समाज-संरचना की दिशा में विभिन्न विकल्पों का निर्माण किया. ये विकल्प क्रान्तिकारी राष्ट्रनिर्माण की मूल मुख्यधारा से भिन्न थे. क्रान्तिकारी धारा में शामिल होने वाले देशों ने अपने अलग-अलग रास्ते चुने और साथ ही इस धारा के पहले के सफल अनुभवों का लाभ भी लिया. इन देशों में किसी ने भी अपनी परम्परा को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया, परन्तु परम्परा के उन तत्त्वों को अवश्य तोड़ा जो उनकी दृष्टि में प्रगति के मार्ग में रुकावट उत्पन्न करते थे. एशिया में एक बड़े देश-चीन-ने सतत क्रान्ति की राह को चुना, जिसका अर्थ था कि चल रही प्रगति धारा का लगातार आकलन होता रहे और साथ ही गतिरोधकों की पहचान भी होती रहे. यह प्रयास केवल नया समाज ही नहीं, नया मानव बनाने का था.

तीसरा रास्ता है ऐसा संस्थात्मक ढाँचा बनाने का जो देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक यथार्थ के अनुरूप हो. इन देशों ने सोचा कि पूर्ण और खुला लोकतन्त्र उनकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता, इसलिए आवश्यक था कि राजनीतिक संस्थाओं के ढाँचे में परिवर्तन किया जाए. उन्होंने या तो नियन्त्रित लोकतन्त्र के रूप को चुना या सैनिक तानाशाही को अपनाया. इन देशों में नये राजनीतिक समीकरणों को मान्यता दिलाने या सही सिद्ध करने का प्रयास हुआ. उनका औपचारिक रूप कोई भी रहा हो, उनकी नीतियों में एक विचारात्मक झुकाव था. कुछ ने क्रान्तिकारी और मूलभूत सुधारवाद का प्रतिरूप प्रस्तुत किया और समतावादी लक्ष्यों की घोषणा की, परन्तु उनका विकास का अन्तर्निहित दर्शन भी पश्चिमी मॉडल से प्रभावित था. प्रयास किया गया कि जातीय़ तथा क्षेत्रीय राष्ट्रीयताएँ समाप्त हों और समग्र राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न हो. परम्परा, विशेष रूप से धर्म से जुड़ी भावनाओं का उपयोग लोगों को जोड़ने के लिए किया गया. परम्परा के किसी भी रूप-धर्म, सामाजिक संरचना तथा जीवन-मूल्य को तोड़ने का प्रयास नहीं किया गया. यह आशा की गयी कि आर्थिक विकास से लोगों के दृष्टिकोणों और जीवन-मूल्यों में परिवर्तन हो जाएगा. इन देशों में विकास प्रक्रिया पर समाज के विशिष्ट प्रभावशाली वर्ग का वर्चस्व रहा. क्रान्तिकारी घोषणाओं के बावजूद विकास का अधिकांश लाभ समाज के विशिष्ट अल्प वर्ग को मिलता रहा. इसका प्रमाण नहीं मिलता कि उन्होंने अपने अनुकूल प्रौद्योगिकी अपनाने का या उपलब्ध प्रौद्योगिकी को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का प्रयास किया हो. जीवन के स्वरूप तथा सामाजिक सम्बन्धों के गठन, दोनों के बारे में भविष्य की योजना के खाकों के रंग धुँधले रहे.


--------------श्यामाचरण दुबे, परम्परा और परिवर्तन से साभार

Sunday, June 8, 2008

कला, मिथक और यथार्थ


we are our own demons, we expel ourselves from our paradise.

---------------------------- ग्रोयटे


मनुष्य का आत्मबोध-यह कि मैं हूँ और मनुष्य हूँ-इतिहास में कोई बहुत पुरानी घटना नहीं है. हम इस घटना, इस आत्मबोध के इतने आदी हो गए हैं कि लगता है मानो यह मानव स्वभाव का कोई शाश्वत तत्त्व हो उसके मनुष्य तत्त्व से जुड़ा हुआ, मनुष्य की चेतना का अभिन्न भाव चिरन्तन और सार्वभौम-जिसका दिशा काल से कोई सन्बन्ध न हो. हम अक्सर भूल जाते हैं कि मनुष्य की आत्मचेतना-कि मैं धरती पर अकेला अजनबी हूँ और स्वयं अपनी नियति के लिए जवाबदेह हूँ-यहूदी-ईसाई परम्परा का अंग है जिसने पश्चिमी सभ्यता को एक विशिष्ट आध्यात्मिक चरित्र प्रदान किया था. इस परम्परा की अन्तिम परिणति-तार्किक परिणति-रेनेसेंस मनुष्य के उस सर्वांगीण व्यक्तित्व में प्रस्फुटित हुई, जिसे अपने ‘अहं’ पर भरोसा था, जो धरती के केन्द्र में था, (उसी तरह जैसे धरती सौरमंडल के केन्द्र में थी), जिसकी कसौटी पर दुनिया की हर चीज नापी जाती थी-आत्मविश्वासी, आत्मकेन्द्रित, गर्वीला मनुष्य.

मनुष्य को अपने इस गरिमा-मंडित आत्मगौरव के लिए काफी भारी मूल्य चुकाना पड़ा. मध्यकाल में वह अपने विश्वासों के भीतर सुरक्षित था-चर्च की चहारदीवारी के भीतर इन विश्वासों पर शंका या सन्देह की आँच नहीं आ सकती थी. सुरक्षा की यह गरमाई आज भी हम यूरोप की मॉनेस्टरियों में देख सकते हैं, जिनकी तंग सँकरी कोठरियों में भिक्षुक और भिक्षुणियाँ अपना जीवन बिताते थे. एक बन्द समाज में मनुष्य स्वतन्त्र न भी हो, अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकता है, इसकी कल्पना कम-से-कम भारतवासी कर सकते हैं-या कुछ दशक पहले तक कर सकते थे. किन्तु यूरोप में रेनेसेंस के बाद सुरक्षा की ये दीवारें एक-एक करके ढहने लगीं. मनुष्य अब खुले में था. स्वाधीन किन्तु अरक्षित. एक समय में ईसाई विश्वदर्शन ने मनुष्य और दुनिया के बीच जो सेतु बनाया था, वह सहसा डगमगाने लगा था.

लूथर ने जो आघात चर्च की आस्था पर किया था, वह कुछ इतना गहरा था कि उसकी भग्न दरारों के बीच पहली बार आत्मशंका की छाया ने निकलकर यूरोपीय मानस को विचलित और उद्वेलित कर दिया था. अब मनुष्य अपने से भागकर कहीं और सिर नहीं छिपा सकता था. पास्कल शायद पहले ईसाई चिन्तक, थे जिन्होंने यूरोपीय मनुष्य के उस भयावह आतंक को समझा था, जो ब्रह्मांड के सूने मौन से उत्पन्न होता है. पहली बार मनुष्य के भीतर यदि ‘चिन्ता’ (anxiety) की अनुभूति हुई, तो शायद इस बिन्दु पर जब धर्मचेतना के धुँधले हाशिये पर लुप्त होता गया और दूसरी तरफ मनुष्य का अपना ‘मैं’, अपनी गौरवपूर्ण अस्मिता एक ऐसे संकीर्ण, अहंग्रस्तदायरे में सिकुड़ गई, जहाँ वह अपने भीतर के अँधेरे के समक्ष नितान्त अवश पड़ता गया. क्या मतलब है इस अँधेरे का? इस प्रश्न के सामने वह बिल्कुल निरुत्तर था. अब मनुष्य विश्व के केन्द्र में नहीं, अपने शून्य के केन्द्र में था-और वहाँ वह बिल्कुल अकेला था.

इसलिए मनुष्य का आत्मबोध अपने होने की चेतना मानव स्वभाव का कोई शाश्वत गुण नहीं है; वह एक प्रक्रिया है जो इतिहास में घटती है-एक दुर्घटना और वरदान दोनों ही. इस प्रक्रिया में आशा और अपशगुन दोनों ही निहिति हैं-स्वतन्त्रता की आशा और अकेलेपन का अपशगुन। मनुष्य की आत्मचेतना दार्शनिक अर्थ में नहीं, जहाँ वह आत्मज्ञान होती है-बल्कि जैविक विकास के अर्थ में-जहाँ मनुष्य को अपने होने, अपने अस्तित्व का बोध होता है-वह आत्मचेतना व्यक्ति की मानसिकता में एक फाँक खींच देती है-और यह फाँक, यह दरार उतनी ही गहरी और विध्वंसात्मक है, जितना वह प्राथमिक पतन जब मानव जाति पहली बार प्रकृति के अभिन्न सम्बन्ध से टूटी थी, विलगित हुई थी और उसने एक सर्वथा उदासीन, सर्वथा भावशून्य विश्व में अपने को नितान्त सीमित, क्षुद्र और क्षणभंगुर पाया था. आज की सभ्यता का संकट और प्रदूषण उस ऐतिहासिक क्षण से शुरू हो गया था, जब मनुष्य प्रकृति से अलग छिटक गया था यह मानव-सभ्यता और मनुष्य की यातना का समान स्रोत है, जो आज हमें घसीटकर ‘अणु युग’ तक ले आया है.

मनुष्य का यह दुहरा अलगाव-प्रकृति से विलगित होना और समाज से अलग टूट जाना-यद्यपि ऐतिहासिक प्रक्रिया के दो अलग-अलग क्षण हैं, किन्तु मनुष्य की चेतना पर उनका प्रभाव बहुत कुछ एक जैसा है-दोनों स्थितियों में ही मनुष्य के भीतर एक भयावह अकेलापन अनाथ हो जाने की कातरता उत्पन्न हो जाती है, वास्तव में जब हम किसी ‘समग्र इकाई’ से टूटते हैं (चाहे वह बच्चे का माँ के गर्भ से अलग होना ही क्यों न हो) तो यह अनाथ-भाव अनिवार्य रूप से हमें आक्रान्त करता है. किन्तु प्रकृति से अलगाव कहीं बहुत गहरे में समाज के अलगाव से भिन्न है; प्रागैतिहासिक-काल का आदिवासी प्रकृति से अलग टूटकर कम-से-कम अपने समूह से जुड़ा रहता है जिसके परिणामस्वरूप उसके निजी अनुभव एक वृहत्तर अनुभव, एक सामूहिक चेतना का ही अंश हैं, जिसमें वह दूसरों के अनुभवों में साझा करता है और दूसरे उसके अनुभव में भाग लेते हैं. किन्तु इससे भिन्न एक सभ्य मनुष्य की आत्मचेतना केवल अपने तक ही केन्द्रित रहती है-उसका निजी व्यक्तित्व एक सम्पूर्ण इकाई है, जिसके भीतर वह समूची बाहरी दुनिया को समेट लेता है-जिसके कारण वह अपने को दूसरों के साथ नहीं, दूसरों के समक्ष या विरुद्ध पाता है. उसका अनुभव यदि दूसरों के अनुभवों में साझा भी करता है, तो अपनी शर्तों पर, एक विराट अनुभव का अंश बनकर नहीं, और जब वह अपने को किसी वृहत्तर इकाई (राज्य तानाशाह या जाति) के प्रति समर्पित करता हूँ, तो भी यह भावना कि ‘मैं अपने को विलय कर रहा हूँ’, उसकी चेतना पर एक याद, एक खरोंच की तरह दगी रहती है.

ऐतिहासिक सभ्य मनुष्य की यह पीड़ा कि वह दूसरों से भिन्न या उनके विरुद्ध है-उस प्रागैतिहासिक मनुष्य की पीड़ा से भिन्न या उनके विरुद्ध है-उस प्रागैतिहासिक मनुष्य की पीड़ा से एक गहरे अर्थ में अलग हो जाती है, जो अपने को प्रकृति के समक्ष तो अकेला पाता है, किन्तु अपने भीतर अकेला महसूस नहीं करता. वास्तव में मिथकों का जन्म ही इसलिए हुआ था कि वे प्रागैतिहासिक मनुष्य के उस आघात और आतंक को कम कर सकें, जो उसे प्रकृति से सहसा अलग होने पर महसूस हुआ था-और मिथक यह काम केवल एक तरह से ही कर सकते थे-स्वयं प्रकृति और देवताओं का मानवीकरण करके। इस अर्थ में मिथक एक ही समय में मनुष्य के अलगाव को प्रतिबिम्बित करते हैं, और उस अलगाव से जो पीड़ा उत्पन्न होती है, उससे मुक्ति भी दिलाते हैं. प्रकृति से अभिन्न होने का नॉस्टाल्जिया, प्राथमिक स्मृति की कौंध, शाश्वत और चिरन्तन से पुनः जुड़ने का स्वप्न ये भावनाएँ मिथक को सम्भव बनाने में सबसे सशक्त भूमिका अदा करती हैं. सच पूछें, तो मिथक और कुछ नहीं प्रागैतिहासिक मनुष्य का एक सामूहिक स्वप्न है जो व्यक्ति के स्वप्न की तरह काफी अस्पष्ट, संगतिहीन और संश्लिष्ट भी है. कालान्तर में पुरातन अतीत की ये अस्पष्ट गूँजें, ये धुँधली आकांक्षाएँ एक तर्कसंगत प्रतीकात्मक ढाँचे में ढल जाती हैं और प्राथमिक यथार्थ की पहली, क्षणभंगुर, फिसलती यादें महाकाव्यों (epik) की सुनिश्चित संरचना में गठित होती हैं. मिथक और इतिहास के बीच महाकाव्य एक सेतु है, जो पुरातन स्वप्नों को काव्यात्मक ढाँचे में अवतरित करता है.

किन्तु महाकाव्य के बुनियादी ‘पैटर्न’ और रूप-गठन का आधार अब भी बहुत हद तक वही ‘मिथक-दृष्टि’ है, जिसके सहारे आदि मनुष्य यथार्थ का बोध प्राप्त करता था, बाहरी दुनिया से अपना रिश्ता जोड़ता था. एक-दूसरे से जुड़े तथ्य और घटनाएँ महाकाव्य के लेखक आदि कवि को उतना प्रभावित नहीं करतीं, जितना सामूहिक अवचेतना से जुड़े रूपक (metaphor) उसकी अन्तर्चेतना को अनुप्राणित और आलोकित करते हैं. रूपक से तथ्य और मिथक से तर्क की तरफ बढ़ती हुई मनुष्य की मानसिकता एक तरह से उस ऐतिहासिक विकास (यदि हम उसे ‘विकास’ कह सकें) को ही रेखांकित करती है, जब मनुष्य की सामूहिक अवचेतना धीरे-धीरे व्यक्ति की आत्मचेतना में परिणत होने लगी थी.

महाकाव्य के मिथकीय नायक का अपनी नियति से सम्बन्ध उतना ही समग्र और सहज है, जितना आदिमनुष्य का सम्बन्ध अन्य व्यक्ति से था; वह सामंजस्य और स्वीकृति का रिश्ता है-विरोध और प्रतिरोध का नहीं. इस रिश्ते में एक तरह का अनिवार्यता है, जो उसे निर्मम और कठोर तो बनाती है, लेकिन त्रासद कभी नहीं. ईलियड में आर्खलीस और महाभारत में कर्ण की नियति जीवनधारा का आत्मसमर्पित (आत्मसंकल्पित नहीं) अंग है, जो उसे देवताओं द्वारा रचित वृहत्तर नाटक से जोड़ देती है. मृत्यु का क्षण त्रासद नहीं होता, क्योंकि वह सम्पूर्ण उपलब्धि का क्षण भी है. किन्तु यह बात हैमलेट पर लागू नहीं होती. वह अपने पिता की हत्या के तथ्य के सामने बिल्कुल अकेला है-और यह तथ्य किसी क्रम, किसी पैटर्न, देवताओं के किसी नाटक में फिट नहीं होता-कभी वह हत्या एक घुन की तरह हैमलेट की आत्मा को खाए जाती है. आर्खलीस के जीवन में उसकी मृत्यु एक अनिवार्य परिणति है, जबकि हैमलेट जिन्दगी के साथ झगड़ता हुआ खत्म हो जाता है-बीच बहस में। होमर से शेक्सपियर तक आते-आते मनुष्य की चेतना में आधारभूत परिवर्तन हो चला था-जहाँ पहले वह अपनी प्रकृति नियति से सम्पूर्ण रूप से जुड़ा था, वहाँ कालान्तर में उसकी आत्मा और नियति के बीच एक काली दरार खिंचती गई और यह दरार इतनी गहरी थी कि वह स्वयं अपनी प्रकृति से निर्वासित होता गया. कला में यह परिवर्तन सीधा सृजन-प्रक्रिया में हुआ; पहले कला जहाँ एक अचेतन रचना थी, अब यह रचनात्मक चेतना की अभिव्यक्ति बन गई; किर्केगार्द जिसे ‘सम्पूर्ण सम्भावना’ कहते थे अब वह टूटकर सन्दिग्ध विकल्पों में बँट गई, जिसमें से कोई भी विकल्प मनुष्य चुन सकता था, किन्तु इस चयन का कोई विश्वसनीय दैवी या नैतिक अनुसमर्थन कहीं न था.

यह वह क्षण था, जब मनुष्य का पहली बार अपने ‘मैं’ इगो से साक्षात्कार हुआ, एक ऐसी आत्मभ्रमित चीज जो स्वयं अपने भीतर खंडित थी. पहले जहाँ मनुष्य अपने भीतर समूची वास्तविकता लेकर चलता था, अब वहाँ सिर्फ खोई हुई दुनिया की एक अपाहिज पंगु स्मृति शेष रह गई थी, वह दुनिया खो गई थी, लेकिन मनुष्य उसे भूल नहीं सका था. वास्तव में ‘ईश्वर की मृत्यु’ को लेकर नीत्शे के भयानक आर्तनाद की पीछे यह कातर आकांक्षा छिपी थी कि उस शब्द को दुबारा खोजा जा सके, जो मनुष्य और मिथक को जोड़ता था. एक ऐसे जीवन्त अनुभव का प्रतीक जिसे मनुष्य के अहम बोध ने इतनी बुरी तरह आहत कर दिया था. यह मनुष्य का पतन था. सच कहें, तो दूसरा पतन क्योंकि पहला पतन वह था, जब वह प्रकृति से खंडित हुआ था. मिथक, जो एक समय में मनुष्य के सर्वांगीण, सम्पूर्ण व्यक्तित्व का पोषक था, अब आत्मपीड़ित स्मृतियों के जाले में बदल गया, मनुष्य के खंडित, ज्वरग्रस्त स्वप्नों में उलझा हुआ, जिसे सिर्फ फ्रायड की सूक्तियों और सिद्धान्तों में ही पकड़ा जा सकता था.

-------------------निर्मल वर्मा, कला का जोखिम से साभार

परम्परा का मूल्याँकन









जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, जो लकीर के फकीर नहीं हैं, जो रूढ़ियाँ तोड़कर क्रान्तिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परम्परा का ज्ञान सबसे ज्यादा आवश्यक है. जो लोग समाज में बुनियादी परिवर्तन करके वर्गहीन शोषणमुक्त समाज की रचना करना चाहते हैं, वे अपने सिद्धान्तों को ऐतिहासित भौतिकवाद के नाम से पुकारते हैं. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इतिहास के ज्ञान के बिना ऐतिहासिक भौतिकता का ज्ञान सम्भव है? कम से कम ऐतिहासिक भौतिकता के संस्थापकों की पुस्तकें पढ़ने से ऐसा नहीं लगता. जो महत्त्व ऐतिहासिक भौतिकवाद के लिए इतिहास का है, वही आलोचना के लिए साहित्य की परम्परा का है. इतिहास के ज्ञान से ही ऐतिहासिक भौतिकवाद का विकास होता है, साहित्य की परम्परा के ज्ञान से ही प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है. ऐतिहासिक भौतिकवाद के ज्ञान से समाज में व्यापक परिवर्तन किये जा सकते हैं और नयी समाज-व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है. प्रगतिशील आलोचना के ज्ञान से साहित्य की धारा मोड़ी जा सकती है और नये प्रगतिशील साहित्य का निर्माण किया जा सकता है. ऐतिहासिक भौतिकवाद कुछ अमूर्त सिद्धान्तों का संग्रह नहीं है, वह मानव समाज के इतिहास का मूर्त ज्ञान है. वैसे ही प्रगतिशील आलोचना किन्हीं अमूर्त सिद्धान्तों का संकलन नहीं है, वह साहित्य की परम्परा का मूर्त ज्ञान है. और यह ज्ञान उतना ही विकासमान है जितना साहित्य की परम्परा.

ऐतिहासित भौतिकवाद के संस्थापकों के अनुसार जब से सभ्यता का विकास हुआ, व्यक्तिगत सम्पत्ति और वर्गों का अभ्युदय हुआ, तब सारी संस्कृति, समस्त साहित्य का विकास ऐसी समाज-व्यवस्था में हुआ है, जिसमें सम्पत्ति अधिकांश जनता के शोषण का साधन रही है. सामन्ती सम्पत्ति और पूँजीवादी व्यव्स्था में पूँजीवादी सम्पत्ति अपने साथ के तमाम आर्थिक सम्बन्धों सहित शोषण-व्यवस्था कायम किये रही है. सभ्य समाज में सदैव सम्पत्ति- शाली वर्गों का प्रभुत्व रहा है. अब जिस नये समाज की रचना करनी है, उसमें इस प्रभुत्व को समाप्त कर दिया जायेगा; जिस नयी सभ्यता की रचना करनी है, वह पुरानी सभ्यता से गुणात्म रूप से भिन्न होगी. तब पुराने इतिहास की ज़रूरत क्या है? नयी सभ्यता को पुरानी सभ्यता की ज़रूरत क्या है?

नयी सभ्यता पुरानी सभ्यता से गुणात्मक रूप से भिन्न होगी, ऐतिहासिक प्रक्रिया का यह एक पक्ष है. दूसरा पक्ष यह है कि वह पुरानी सभ्यता की समस्त उपलब्धियों को आत्मसात् करके आगे बढ़ेगी और इतने बड़े पैमाने पर, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर, उन्हें अपनायेगी कि वैसा कार्य मानव इतिहास में अभूतपूर्व होगा.

मनुष्य जाति का इतिहास- आदिम गण समाजों के विघटन के बाद-वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. जब-जब शोषित वर्गों ने अपने अधिकारों के लिए, अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष किया, तब-तब उनका यह संघर्ष उनके उत्तराधिकारी नये समाज के विधायकों के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है. इसके साथ उन्होंने अपने वर्ग हितों के अनुकूल अपनी संस्कृति, अपने साहित्य की रचना की है. पर इसके अलावा सभ्यता का इतिहास वर्ग-सहयोग का इतिहास भी है. भले ही यह सहयोग शोषक वर्ग के लोगों को फुसलाकर, डरा-धमकाकर या दबाकर प्राप्त किया हो, बलप्रयोग द्वारा उन्हें अपनी आज्ञा मानने पर बाध्य किया हो, पर है वह वर्ग-सहयोग. प्रश्न इच्छा-अनिच्छा का नहीं है, प्रश्न ऐतिहासिक प्रक्रिया के वस्तुगत रूप का है. सैकड़ों पीढ़ियों तक श्रमिक जनता ने जिस सभ्यता का निर्माण किया है, जो उसके श्रम के बिना अस्तित्व ही में न आती, क्या उनके प्रति उनका नकारात्मक रुख अपनाना सही है? अनेक देशों में ऐसा हुआ है कि सामन्ती व्यवस्था खत्म करने के बाद जनता ने राजप्रासादों का उपयोग अपने हित में किया. उसने उसकी पहले से और भी अधिक रक्षा की और पहले की अपेक्षा उनका और भी अच्छा उपयोग किया. तब पुरानी संस्कृति के कौन से तत्त्व श्रमिक जनता के काम आ सकते हैं, कौन से तत्त्व उसके लिए हानिकारक हैं, इसका निर्धारण आवश्यक होता है.

ऐतिहासिक विकासक्रम में किसी भी समाज व्यवस्था के अन्तर्गत सम्पत्तिशाली वर्ग की भूमिका उस व्यवस्था के अभ्युदय काल में यह सम्पत्तिशाली वर्ग पुरानी व्यवस्था को बदलता है और सभ्यता के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है. अपने ह्रास काल में वह अपना प्रभुत्व कायम रखना चाहता है, सामाजिक परिवर्तन के आड़े आता है, सभ्यता के विकास में बाधक बनता है दोनों स्थितियों में वह जिस तरह की संस्कृति को प्रश्रय देता है, उसमें बहुत बड़ा अन्तर है.

इसलिए साहित्य की परम्परा का मूल्यांकन करते हुए सबसे पहले हम उस साहित्य का मूल निर्धारित करते हैं जो शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमिक जनता के हितों को प्रतिबिम्बित कराता है. इसके साथ हम उस साहित्य पर ध्यान देते हैं जिसकी रचना का आधार शोषित जनता का श्रम है, और यह देखने का प्रयत्न करते हैं कि वह वर्तमान काल में जनता के लिए कहाँ तक उपयोगी है और उसका उपयोग किस तरह हो सकता है. इसके अलावा जो साहित्य सीधे सम्पत्तिशाली वर्गों की देख-रेख में रचा है और उनके वर्ग हितों को प्रतिबिम्बित करता है, उसे भी परखकर देखना चाहिए कि यह अभ्युदयशील वर्ग का साहित्य है या ह्रासमान वर्ग का. यह स्मरण रखना चाहिए कि पुराने समाज में वर्गों की रूप-रेखा कभी बहुत स्पष्ट नहीं रही. जहाँ पूँजीवाद का यथेष्ट विकास हो गया है, वहीं यह सम्भावना होती है कि सम्पत्तिशाली और सम्पत्ति हीन वर्ग एक-दूसरे के सामने पूरी तरह विरोधी बनकर खड़े हों. पुराने साहित्य में वर्ग-हित साफ़-साफ़- टकराते हुए दिखाई दें, इसकी सम्भावना कम होती है. सभ्यता के अनेक तत्त्वों की तरह साहित्य में ऐसे तत्त्व होते हैं जो विरोधी वर्गों के काम में आते हैं. आग की तरह जलाकर खाना पकाना मानव सभ्यता का सामान्य तत्त्व बन गया है. कल-कारखानों में भाप और बिजली से चलने वाली मशीनों का उपयोग समाजवादी व्यवस्था में होती है और पूँजीवादी व्यवस्था में भी. सभ्यता का हर स्तर वर्गबद्ध नहीं होता. इसी तरह साहित्य का हर स्तर सम्पक्तिशाली वर्गों के हितों से बँधा हुआ नहीं रहता. साहित्य की इस व्यापकता को स्वीकार न करना वैसे ही है जैसे समाजवादी व्यवस्था में बिजली का उपयोग न करना क्योंकि इसका आविष्कार पूँजीवादी समाज में हुआ था. और उसका उपयोग भी पूँजीपतियों ने अपने हित में किया था.

साहित्य मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से सम्बद्ध है. आर्थिक जीवन के अलावा मनुष्य एक प्राणी के रूप में भी अपना जीवन बिताता है. साहित्य में उसकी बहुत-सी आदिम भावनाएँ प्रतिफलित होती हैं जो उसे प्राणिमात्र से जोड़ती हैं. इस बात को बार-बार कहने में कोई हानि नहीं है कि साहित्य विचारधारा मात्र नहीं है. उसमें मनुष्य का इन्द्रिय-बोध, उसकी भावनाएँ आन्तरिक प्रेरणाएँ भी व्यंजित होती हैं. साहित्य का यह पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है.

जिस समय ऐतिहासिक भौतिकता की स्थापना हुई, उस समय जीव-विज्ञान में विकासवाद का बोलबाला था. यह विकासवाद सही हो चाहे गलत, यह बात सच है कि साहित्य में विकास-प्रक्रिया उसी तरह सम्पन्न नहीं होती जैसे समाज में. सामाजिक विकास-क्रम में सामन्ती सभ्यता की अपेक्षा पूँजीवादी सभ्यता को अधिक प्रगतिशील कहा जा सकता है और पूँजीवादी सभ्यता के मुकाबले समाजवादी सभ्यता को. पुराने चरखे और करघे के मुकाबले मशीनों के व्यवहार से श्रम की उत्पादकता बहुत बढ़ गयी है. पर यह आवश्यक नहीं है कि सामन्ती समाज के कवि की अपेक्षा पूँजीवादी समाज का कवि श्रेष्ठ हो। यह भी सम्भव है कि आधुनिक सभ्यता विकास कविता का विरोधी हो और कवि स्वयं बिकाऊ माल बन रहा हो. व्यवहार में यही देखा जाता है कि 19वीं और 20वीं सदी के कवि-क्या भारत में और क्या यूरुप में –पुराने कवियों को घोटे जा रहे हैं और कहीं उनके आस-पास पहुँच जाते हैं तो अपने को धन्य मानते हैं. ये जो तमाम कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों की रचनाओं का मनन करते हैं, वे उनका अनुकरण नहीं करते उससे सीखते हैं, और स्वयं नयी परम्पराओं को जन्म देते हैं. और जो साहित्य दूसरों की नकल करके लिखा जाए, वह अधम कोटि का होता है और सांस्कृति असमर्थता का सूचक होता है. जो महान साहित्यकार हैं, उनकी कला की आवृत्ति नहीं हो सकती, यहाँ तक कि एक भाषा से दूसरी भाषा को अनुवाद करने पर उनका कलात्मक सौन्दर्य ज्यों-का-त्यों नहीं रहता. औद्योगिक उत्पादन और कलात्मक उत्पादन में यह बहुत बड़ा अन्तर है. अमरीका ने ऐटमबम बनाया, रूस ने भी बनाया, पर शेक्सपियर के नाटकों जैसी चीज़ का उत्पादन दुबारा इग्लैंड में भी नहीं हुआ.

भौतिकवाद दो तरह का है, एक यान्त्रिक भौतिकवाद, दूसरा द्धन्द्धात्मक भौतिकवाद. यान्त्रिक भौतिकवाद की विशेषता यह है कि वह चेतना को आर्थिक सम्बन्धों का प्रतिबिम्ब मात्र मानता है. प्रतिबिम्ब यान्त्रिक होता ही है. जब चेतना प्रतिबिम्ब है, तब संस्कृति का ताना-बाना भी पूरी तरह बदल जाता है. इस यान्त्रिक भौतिकवाद का विकास फ्रान्स में हुआ; 19वीं सदी में जब भौतिक विज्ञान का विकास हुआ, तो इस विज्ञान का दार्शनिक दृष्टिकोण इसी यान्त्रिक भौतिकवाद से प्रभावित हुआ. इसके विपरीत द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मनुष्य की चेतना को आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित मानते हुए उसकी सापेक्ष स्वाधीनता स्वीकार करता है. आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित होना एक बात है, उनके द्वारा चेतना का निर्धारित होना और बात है. भौतिकता का अर्थ भाग्य-बाद नहीं है. सब कुछ परिस्थितियों द्वारा अनिवार्यतः निर्धारित नहीं हो जाता. यदि मनुष्य परिस्थितियों का नियामक नहीं है तो परिस्थितियाँ भी मनुष्य की नियामक नहीं हैं. दोनों का सम्बन्ध द्वन्द्वात्मक है. यही कारण है कि साहित्य सापेक्षरूप में स्वाधीन होता है.

गुलामी अमरीका में थी और गुलामी एथेन्स में भी, किन्तु एथेन्स की सभ्यता ने सारे यूरुप को प्रभावित किया और गुलामों के अमरीकी मालिकों ने मानव संस्कृति को कुछ भी नहीं दिया. सामन्तवाद दुनिया भर में कायम रहा. पर इस सामन्ती दुनिया में महान् कविता के दो ही केन्द्र थे- भारत और ईरान। पूँजीवादी विकास यूरुप के तमाम देशों में हुआ पर रैफेल, लेओनार्दों दा विंची और माइकेल ऐंजेलो इटली की देन हैं. यहाँ हम एक ओर यह देखते हैं कि विशेष सामाजिक परिस्थितियों में कला का विकास सम्भव होता है, दूसरी ओर हम यह देखते हैं कि समान सामाजिक परिस्थितियाँ होने पर भी कला का समान विकास नहीं होता. यहाँ हम असाधारण प्रतिभाशाली मनुष्यों की अद्वितीय भूमिका भी देखते हैं. जिस तरह औद्योगिक उत्पादन का समाजीकरण पूँजीवादी व्यवस्था में होता हैं, उस तरह साहित्यिक रचना का समाजीकरण नहीं होता. कारखाने में 1500 मज़दूर मिलकर दिन-प्रतिदिन थान के थान कपड़े निकाल सकते है. यदि साहित्यकारों को साहित्य-रचना के कारखाने में भर्ती कर दिया जाए तो हो सकता है कि उनके कुछ दोष दूर हो जायें, अथवा वे एक दूसरे से इतना लड़ें कि और किसी काम के लिए उन्हें फुरसत न मिले, पर नियमित रूप से उच्च कोटि के उपन्यास, काव्य, नाटक के लिए उन्हें फुरसत न मिले, पर नियमित रूप से उच्च कोटि के उपन्यास, काव्य, नाटक, पंचवर्षीय योजना के अनुसार, उस कारखाने से निकलते रहेंगे, इसकी सम्भावना ज़रा कम है. साहित्यकार आपसी सहयोग से लाभ उठाते हैं पर अभी उस तकनीक का पता नहीं लगाया जा सका, जिसे लोगों को सिखाकर साहित्य का सामूहिक उत्पादन किया जा सके.

साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका निर्णायक है. इसका यह अर्थ नहीं कि ये मनुष्य जो कुछ करते हैं. वह सब अच्छा ही अच्छा होता है, या उनके श्रेष्ठ कृतित्व में दोष नहीं होते है. कला का पूर्णतः निर्दोष होना भी एक दोष है. ऐसी कला निर्जीव होती है. इसलिए प्रतिभाशाली मनुष्यों की अद्वितीय उपलब्धियों के बाद कुछ नया और उल्लेखनीय करने की गुंजाइश बनी रहती है. आजकल व्यक्ति पूजा की काफी निन्दा की जाती है. किन्तु जो लोग सबसे ज्यादा व्यक्ति-पूजा की निन्दा करते हैं, वे सबसे ज़्यादा व्यक्ति-पूजा का प्रचार भी करते हैं. अन्तर इतना होता है कि ब्रह्मा की जगह उन्होंने विष्णु को बिठा दिया. लेकिन पूजा तो पूजा. ईश्वर अल्ला तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान. यदि कोई भी साहित्यकार आलोचना से परे नहीं है, तो राजनीतिज्ञ यह दावा और भी नहीं कर सकते, इसलिए कि साहित्य के मूल्य, राजनीतिक मूल्यों की अपेक्षा, अधिक स्थायी हैं. अंग्रेज कवि टेनीसन ने लैटिन कवि वर्जिल कर एक बड़ी अच्छी कविता लिखी थी. इसमें उन्होंने कहा है कि रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो गया. पर वर्जिल के काव्य सागर की ध्वनि-तरंगें हमें आज भी सुनायी देती हैं और हृदय को आनन्द-विह्यल कर देती हैं कि जब ब्रिटिश साम्राज्य का कोई नाम लेवा और पानीदेवा नहीं रह जायेगा, तब शेक्सपियर, मिल्टन और शेली विश्व संस्कृति के आकाश में वैसे ही जगमगाते नज़र आयेंगे जैसे पहले, और उनका प्रकाश पहले की उपेक्षा करोड़ों नयी आँखें देखेंगी.

साहित्य के विकास में प्रतिभाशाली मनुष्यों की तरह, जनसमुदायों और जातियों की विशेष भूमिका होती है. इसे कौन नहीं जानता कि पुरुष के सांस्कृतिक विकास में जो भूमिका प्राचीन यूनानियों की है, वह अन्य किसी जाति की नहीं है. जनसमुदाय जब एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में प्रवेश करते हैं तब उनकी अस्मिता नष्ट नहीं हो जाती. प्राचीन यूनान अनेक गणसमाजों में बँटा हुआ था. आधुनिक यूनान एक राष्ट्र है. यह आधुनिक यूनान अपनी प्राचीन संस्कृति से अपनी एकात्मकता स्वीकार करता है या नहीं? 19वीं सदी में शेली और बायरन अपनी स्वाधीनता के लिए लड़ने वाले यूनानियों को ऐसी एकात्मकता पहचानने में बड़ा परिश्रम किया. भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान इस देश ने इसी तरह अपनी एकात्मकता पहचानी. इतिहास का प्रवाह ही ऐसा है कि वह विच्छिन्न है और अविच्छिन्न भी. मानव समाज बदलता है और अपनी पुरानी अस्मिता कायम रखता है. जो तत्त्व मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करते हैं, उनमें इतिहास और सांस्कृतिक परम्परा के आधार पर निर्मित यह अस्मिता का ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है.

बंगाल विभाजित हुआ और है, किन्तु जब तक पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के लोगों को अपनी साहित्यिक परम्परा का ज्ञान रहेगा, तब तक बंगाली जाति सांस्कृतिक रूप से अविभाजित रहेगी. विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना कीजिए, तो ज्ञात हो जायेगा कि साहित्य की परम्परा का ज्ञान कहाँ ज्यादा है, कहाँ कम है, और इस न्यूनाधिक ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं. एक भाषा बोलने वाली जाति की तरह अनेक भाषाएँ बोलनेवाले राष्ट्र की भी अस्मित होती है. संसार में इस समय अनेक राष्ट्र बहुजातीय हैं, अनेक भाषा-भाषी हैं. जिस समय राष्ट्र के सभी तत्त्वों पर मुसीबत आती है, तब उन्हें अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का ज्ञान होता बहुत अच्छी तरह हो जाता है. जिस समय हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया, उस समय यह राष्ट्रीय अस्मिता जनता के स्वाधीनता संग्राम की समर्थ प्रेरक शक्ति बनी. सोवियत संघ के लोग हिटलर-विरोधी संग्राम को उचित ही महान् राष्ट्रीय (अथवा देशभक्तिपूर्ण) संग्राम कहते हैं. इस युद्ध के दौरान खासतौर से रूसी जाति ने बार-बार अपनी साहित्य-परम्परा का स्मरण किया. सोवियत समाज ज़ारशाही रुस के समाज से भिन्न है. समाज-व्यवस्था के विचार से इतिहास का प्रवाह विच्छिन्न है, जातीय अस्मिता की दृष्टि से यह प्रवाह अविच्छन्न है. ज़ारशाही रूस जाति की अस्मिता को सुदृढ़ और पुष्ट करने वाले महान् साहित्यकार हैं. समाजवादी व्यवस्था कायम होने पर जातीय अस्मिता खण्डित नहीं होती वरन् और पुष्ट होती है. इसके साथ सोवियत संघ में बहुजातीय राष्ट्रीयता का पुनर्जन्म हुआ है और यह राष्ट्रीयता अब एक सामाजिक शक्ति है जैसी वह 1917 से पहले नहीं थी. ज़ारशाही रूस में बहुत-सी जातियाँ पराधीन बनाकर रखी गयी थीं. उन सब पर रूसी जाति के सामन्त और पूँजीपति शासन करते थे. जैसे और बहुत-से साम्राज्य होते हैं, वैसे ही यह भी साम्राज्य था. 1917 की क्रान्ति के बाद रूसी और गैररूसी जातियों के आपसी सम्बन्धों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ. बहुत-सी जातियाँ सोवियत संघ में शामिल न हुईं, अलग हो गयीं. कुछ विलम्ब से, दूसरे महायुद्द से कुछ ही पहले, अन्य जातियाँ उसमें सामिल हुईं. सोवियत संघ में आज जितनी जातियाँ शामिल हैं, उनका वैसा मिला-जुला राष्ट्रीय इतिहास नहीं है, जैसा भारत की जातियों का है. राष्ट्र के गठन में इतिहास का अविच्छिन्न प्रवाह बहुत बड़ी निर्धारक शक्ति है. यूरुप के लोग यूरोपियन संस्कृति की बात करते हैं. पर यूरुप कभी राष्ट्र नहीं बना. और अब तो पूर्वी यूरुप और पश्चिमी यूरुप, दो यूरुप का अलग उल्लेख आम बात है. संसार का कोई भी देश, बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से, इतिहास को ध्यान में रखें तो, भारत का मुकाबला नहीं कर सकता.

यहाँ राष्ट्रीयता एक जाति द्वारा दूसरी जातियों पर राजनीतिक प्रभुत्व कायम करके स्थापित नहीं हुई. वह मुख्यतः संस्कृति के निर्माण में इस देश के कवियों का सर्वोच्च स्थान है. इस देश की संस्कृति में रामायण और महाभारत को अलग कर दें, तो भारतीय साहित्य की आन्तरिक एकता टूट जायेगी. किसी भी बहुजातीय राष्ट्र के सामाजिक विकास में कवियों की ऐसी निर्णायक भूमिका नहीं रही, जैसी इस देश में व्यास और वाल्मीकी की है. इसलिए किसी भी देश के लिए साहित्य की परम्परा का मूल्याँकन उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना इस देश के लिए है.

______________ रामविलास शर्मा, परम्परा का मूल्यांकन से साभार